बेटीयाँ

क्या सच में होती हैं घर का श्रृंगार बेटियां,
फिर समाज में क्यों दिखती आज भी लाचार हैं बेटियां
माना कि पापा की लाडली ,माँ की दुलारी हैं बेटियां,
पर सड़क पर आज भी वहशी दरिंदो की शिकार है बेटियां ।
नवरात्रों में देवी और घर की लक्ष्मी है बेटियां ,
पर क्यों कोख में आज भी मार दी जाती है बेटियां
कहने को दो घरो की शान है बेटियां , पर सच इतना है कि
अपने घर में भी मेहमान है बेटियां ।
खेल, शिक्षा हर जगह कमाती नाम हैं बेटियां,
पर समाज में आज भी गुमनाम है बेटियां
कन्हा ख़ुद के लिए जीती हैं बेटियां , घर समाज को संवार खुद को भूल जाती हैं बेटियां
कुछ पैसो के लिए आज भी बेच दी जाती हैं बेटियां ।
बेटो से आज कंहा कम है बेटियां, हर जगह नित नया आगाज़ है बेटियां
पर आज भी दहेज़ के लिये जला दी जाती हैं बेटियां
खुद को भूल दूसरों के लिए जीती है बेटियां ,
माँ, बहन, और पत्नी कई रूपों में फर्ज निभाती हैं बेटियां
पर समाज में आज भी ठुकरा दी जाती हैं बेटियां ।
खुद ही खुद से जंग लड़ आगे बढ़ रही है बेटियां
मतलब की इस दुनिया में प्यार सीखा रही हैं बेटियां,
दुनिया की इस भीड़ में अकेली ही चल रही है बेटियां,
पोस्टरों, भाषणों में ही बचा रहे हैं बेटियां,
वरना सच है कि कोख में मरवा रहे है बेटियां ,
खुदगर्ज इस दुनियां में आज भी अस्तित्व की तलाश में भटक रही हैं बेटियां।
आशीष बहल चुवाड़ी जिला चम्बा

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अध्यापक, कवि, लेखक व विभिन्न समाचार पत्रों में स्तम्भ लेखन
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