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बेटियों की हाय (कविता)

Onika Setia

Onika Setia

कविता

January 11, 2017

बेटिओंकी हाय (कविता)

सितम से हार कर जब,

लब हो जाते हैं खामोशें।

अपने हक केलिए लड़ते हुए’

जब ख़त्म हो जाये जोश ।

जब टूट जाती है शैतानो की सीमायें ।
और वह गुरुर में अंधे होजाएं.

ज़ुल्म के नशे में चूर हो जायें ।

पागल हो जायें .

तब ! हाँ तब !

लेती है कुदरत अंगड़ाई ।

एक कयामत उभरती है.

सब तरफ बर्बादी देती है दिखाई ।

तब यह ख़ामोशी, यह आह,

तूफान बनकर टूटती है ।

बरसों से दबी ,कुचली हुई ताक़त,

ज़लज़लों से झूझती है ।

साथ जो मिल जाय एक बार समय का,

उसके तो फिर कहने ही क्या!

करवट बदल ले वोह बस एक बार!

तो रावण भी क्या !

उखाड़ सकती है पाप की जड़ को.

एक मजबूर, मजलूम और मासूम की हाय ,

क्या रंग लाती है ?

जब कहकशां टूट कर शैतानो पर गिरती है ।

तो यह जानलो ताक़त वालो!,

ज़ुल्म की भी सीमा होती हैें।

जब जोश में आती है कुदरत ,
और रंग लाती है बेटियों की हाय ।

Author
Onika Setia
नाम -- सौ .ओनिका सेतिआ "अनु' आयु -- ४७ वर्ष , शिक्षा -- स्नातकोत्तर। विधा -- ग़ज़ल, कविता , लेख , शेर ,मुक्तक, लघु-कथा , कहानी इत्यादि . संप्रति- फेसबुक , लिंक्ड-इन , दैनिक जागरण का जागरण -जंक्शन ब्लॉग, स्वयं... Read more
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