Jan 10, 2017 · कविता

बेटियॉ

बेटियॉ ..
वेदों की माने तो गाथा हैं वो
किसना के साथ भोली राधा हैं वो
घर पे है तो मर्यादा है वो
युद्ध स्थल पे वीरांगना है वो

शत शत नमन उन बेटियों को
जो फलती कही है बढ़ती कही है
एक लता की भॉति विस्तार करती कही है

मर्दुल सी कोमल सी न जाने कितने काज संवारती है
एक बेटी जब जन्मती कितने रिश्ते नॉधती है ..

शक्ति रूपा /शा न्ति स्वरूपा ..
पर्याय बनना जानती है

अथक है अदम्य है अटूट है आवेश है
एक बेटी इन सभी का अवशेष है
हनन इसका करोगे तो कैसे जी पाओगे ?

स्रष्टी का आधार यही है
वंश बेल कैसे बढ़ाओगे ?
तिरस्क्रित कर समाज मे कै से रह पाओगे ?

बेटी है तो कल है
बेटी नही तो ये मन बेकल है
घर कीं लछ्मी किसे बनाओगे
मान नही दोगे तो कैसे रह पाओगे ?

श्रद्धा सुमन का पात्र है ये
प्रेम और ममता का एहसास है ये
लाडो बन दिल मे उतर जाती है
असीम प्यार से सारे घर को महकाती है
अाओ शपथ ले लो आज
किसी बेटी को निर्भया नही बनाओगे
असमय ही काल के गर्त मे नही ले जाओगे

पूज्यनीय है वंदनीय है हर पल मान उनका बढ़ाओगे
हर पल मान उनका बढ़ाओगे ..

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साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे...
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