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बेटिया

Dr. Vivek Kumar

Dr. Vivek Kumar

कविता

January 24, 2017

बेटिया समय के साथ
समझने लगती है
इस रहस्य को
क्यों असमय बूढ़े होते जा रहे हैं उसके पिता।
वह जानती है,
उसकी बढ़ती उम्र ही है
पिता के बार्धक्य का असली कारण।

कभी-कभी
मन ही मन कुढ़ती भी है कि
आख़िर वह क्यों
समय से पहले बड़ी हो गई।

पता नहीं कब और कैसे
वह जान जाती है
लगभग सब कुछ कि
उसे क्या-क्या करना है और क्या नहीं,
कब और किसके सामने मुस्कुराना है
और वह भी कितना…

तमाम अनिश्चंतताओं उतार-चढ़ाव के बावजूद
बेटिया रहती है जीवन भर बेखबर
कि बनता है संपूर्ण घर
सिर्फ और सिर्फ उन्हीं से।

वह पूरी लगनशीलता से
संजोती है स्मृतियों के
गुल्लक में गुजरे अच्छे दिनों को ।

बेटियाँ रहती है अपरिचित
इस सच से कि ,
वह है तो घर है
रिश्ते-नाते हैं
तुलसी चौरे पर अनवरत टिमटिमाता दीया है
व्रत-त्योहार है
नेम-धरम है
गुड्डे-गुड़ियाँ और उनकी शादियाँ हैं
सृजन है,
जीवन है।

सचमुच,
बेटियाँ होती है
घर परिवार में रची-बसी
फूलों की सुगंध की तरह
जो दिखाई नहीं देती
लेकिन अपनी उपस्थिति का
सदेैव बोध कराती है।

डॉ. विवेक कुमार
तेली पाड़ा मार्ग, दुमका-814 101

Author
Dr. Vivek Kumar
नाम : डॉ0 विवेक कुमार शैक्षणिक योग्यता : एम0 ए0 द्वय हिंदी, अर्थशास्त्र, बी0 एड0 हिंदी, पी-एच0 डी0 हिंदी, पीजीडीआऱडी, एडीसीए, यूजीसी नेट। उपलब्धियाँ : कादम्बिनी, अपूर्व्या, बालहंस, चंपक, गुलशन, काव्य-गंगा, हिंदी विद्यापीठ पत्रिका, जर्जर-कश्ती, खनन भारती, पंजाबी-संस्कृति, विवरण पत्रिका,... Read more
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