बेटिया

बेटिया समय के साथ
समझने लगती है
इस रहस्य को
क्यों असमय बूढ़े होते जा रहे हैं उसके पिता।
वह जानती है,
उसकी बढ़ती उम्र ही है
पिता के बार्धक्य का असली कारण।

कभी-कभी
मन ही मन कुढ़ती भी है कि
आख़िर वह क्यों
समय से पहले बड़ी हो गई।

पता नहीं कब और कैसे
वह जान जाती है
लगभग सब कुछ कि
उसे क्या-क्या करना है और क्या नहीं,
कब और किसके सामने मुस्कुराना है
और वह भी कितना…

तमाम अनिश्चंतताओं उतार-चढ़ाव के बावजूद
बेटिया रहती है जीवन भर बेखबर
कि बनता है संपूर्ण घर
सिर्फ और सिर्फ उन्हीं से।

वह पूरी लगनशीलता से
संजोती है स्मृतियों के
गुल्लक में गुजरे अच्छे दिनों को ।

बेटियाँ रहती है अपरिचित
इस सच से कि ,
वह है तो घर है
रिश्ते-नाते हैं
तुलसी चौरे पर अनवरत टिमटिमाता दीया है
व्रत-त्योहार है
नेम-धरम है
गुड्डे-गुड़ियाँ और उनकी शादियाँ हैं
सृजन है,
जीवन है।

सचमुच,
बेटियाँ होती है
घर परिवार में रची-बसी
फूलों की सुगंध की तरह
जो दिखाई नहीं देती
लेकिन अपनी उपस्थिति का
सदेैव बोध कराती है।

डॉ. विवेक कुमार
तेली पाड़ा मार्ग, दुमका-814 101

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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