Skip to content

बेटियां

Bhupendra Rawat

Bhupendra Rawat

कविता

January 10, 2017

देखो जन्म लिया जब मैंने
सबसे में अंजान थी।

लड़के की चाह में जन्मी इस जग मे
मैं बढ़ी मुश्किल से,
दुनिया तब बढ़ी हैरान और परेशान थी।
लुप्त हो गयी सबकी चेहरों की मुस्कान थी।

धीरे धीरे बढ़ी हुई,में भी
कई रिश्तों माँ,बहन,पत्नी
से पहचान थी

अवसर के अभाव,हमारे लिए इस जग में
पंक्षी की भांति रखते हैं, पिंजरे में।
अगर,अवसर मिले हमें भी जब जब,
तब तब सफलता ही परिणाम थी।

आज़ादी की लड़ाई में रानी लक्ष्मी की
भी एक तलवार थी।
ऐवरेस्ट की चोटी पर खड़ी
बछेंद्री पाल थी।
हवा में हमने भी भरी उड़ान थी।

इस जग में रोशन नाम किया जब मैंने
हर जबाँ पर नाम , मे ही जग और घर घर की पहचान थी।

संस्कारो को जीवित करने,
उन्हें निभाने का एक में ही नाम थी।

लड़की के जन्म पर ख़लिश चहरों
पर मेरे कारण ही मुस्कान थी।

नसीब हो जिनका उनके घर ही जन्म लेती है, बेटियां
अपनी एक मुस्कान से सबका दिल खुश कर दे जो
वैसा ही एक उपहार होती है बेटियां।
गुलिस्ता का चुनिंदा गुलाब होती है,बेटियां

लक्ष्मी,इन्दिरा, किरण और सायना जैसी मिसाल होती है,बेटियां

भूपेंद्र रावत

Share this:
Author
Bhupendra Rawat
M.a, B.ed शौकीन- लिखना, पढ़ना हर्फ़ों से खेलने की आदत हो गयी है पन्नो को जज़बातों की स्याही से रँगने की अब बगावत हो गईं है ।

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you