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बेटियां..

Saksena Dr.Shipra Shilpi

Saksena Dr.Shipra Shilpi

कविता

January 21, 2017

???वेदना के स्वर तितली के संग???
काश
मै
तितली होती
उडती मदमस्त फिजाओं में
इन्द्रधनुषी रंगों में रंगकर
रंगती सारे सपनो को
सपने जो बुनती थी मै
अरमानो का पंख लिए
बहुत दूर उडती थी मै
देख कहा करते थे बाबा
नाम करेगी रोशन तू
आसमानों पर उड़ने वाली
तारों सा चमकेगी तू
चमक रही हूँ अब भी मै
बन सुर्खियाँ अखबारों की
पंख नोच लिए वहशियों ने
पड़ी हुई लाचारों सी
तड़प रही हूँ सिसक रही हूँ
रंग सारे बिखर गए
बिखर गया हर सपना मेरा
सर शर्म से झुक गए
सूनी आँखों से बाबा
देख रहे टूटे तारे
अब तितली जैसी कहाँ बेटियाँ
पंख तो सारे क़तर गए
काश मै तितली होती
उड़ जाती आसमानों में
वहशी इतना उड़ नहीं सकते
ढूंढ ना पाते वो मुझको
छुप जाती फूलों के रंग में
पर फूल तो सारे मसल गए
सोच नहीं जब तक बदलेगी
तितली तब तक उड़ ना सकेगी
आसमान पर उड़ने वाली
धरती पर भी रह न सकेगी ………..
डॉ शिप्रा शिल्पी [कोलोन जर्मनी ]

Author
Saksena Dr.Shipra Shilpi
?रेशमी से नर्म ख्वाब है शब्दों की झंकार है? ?कुछ जाफरानी खुशबुएं,अपनों का प्यार है? ?साथ हो गर आपका,ये ज़िन्दगी साकार है? ?डॉ.शिप्रा शिल्पी?
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