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बेटियां ना मुक्तक छंद

Dr ShivAditya Sharma

Dr ShivAditya Sharma

कविता

January 11, 2017

बेटियां होती है वो कोहिनूर
जो अपनी होकर भी गैरों के घर रहती है जिम्मेदारी निभाती हैं निस्वार्थ
अविरल धारा जैसे गंगा की बहती है
मां बेटी बहन पत्नी
कितने रिश्तो का बोझ ये सहती है
ना दिखती फिर भी शिकन चेहरे पर
ना दर्द अपना किसी से कहती है

बेटी होने पर रोने वालों अपना नजरिया बदलो जरा
खोलो सोच के बंद दरवाजे चारों और देखो जरा

देश को पी वी सिंधु और शाक्शी ने जो पदक दिला सम्मान दिया
तो बोलो एक बेटी ने तुम्हारे घर पैदा होकर कैसे तुम्हारा अपमान किया
क्या नहीं दिखी दीपा कर्माकर जो दुनिया से लोहा ले बैठी थी
क्या देखे थे उसने सुख-साधन एक गरीब घर कि वो बेटी थी

लगने दो पंख अरमानों के सपनों की उड़ान उड़ने दो
क्या भूल गए कल्पना चावला को जो अंतरिक्ष में जा पहुंची थी

ना बांधो इनको बंधनों में जैसे मुक्तक छंद
इन को अपनी कहानी कहने दो
रहने दो इनको जैसे कविता
इनको अपने ही ढंग से बहने दो।

Author
Dr ShivAditya Sharma
Consultant Endodontist. Doctor by profession, Writer by choice. बाकी तो खुद भी अपने बारे में ज्यादा नहीं जानता, रोज़ जिन्दगी जैसी चोट करती है वैसा ही ढल जाता हूँ।
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