बेटियाँ

छू लूँगी गगन एकदिन न मारो कोख पावन में।
फूल-सी खिलने दो मुझको इस दुनिया के चमन में।।

देख रिश्तों की लाज की सूरत मैं बसाऊँगी आँखों में।
कल्पना की कल्पना कर कल्पना हो जाऊँगी आँखों में।
रहेगा झुका सिर सदैव माता-पिता के नमन में।
फूल-सी खिलने दो मुझको इस दुनिया के चमन में।।

आहिल्या लक्ष्मी इंदिरा सरोजिनी और सावित्री फूले।
चाँद-सी चमकी हैं इन्हें भूला हैं न कभी कोई भूले।
मैं भी चलूँ नक्शे-क़दम लक्षित कर लक्ष्य नयन में।
फूल-सी खिलने दो मुझको इस दुनिया के चमन में।।

माँ मेरी कल थी चाह तेरी आज है वही चाह मेरी।
दे जन्म ख़ुशी से कर पालन-पोषण हो पूर्ण आह मेरी।
उमंग तरंग खुशी के रंग बिखरें घर-आँगन में।
फूल-सी खिलने दो मुझको इस दुनिया के चमन में।।

बेटे से तो बेटी रहे है “प्रीतम” सदा दो क़दम आगे।
बेटा एक बेटी दो घर सँवारती क्यों ना प्यारी लागे।
एक बेटी का सपना हो पूरा जग से मिलन में।
फूल-सी खिलने दो मुझको इस दुनिया के चमन में।।

छू लूँगी गगन मैं एकदिन न मारो कोख पावन में।
फूल-सी खिलने दो मुझको इस दुनिया के चमन में।।

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राधेयश्याम बंगालिया “प्रीतम” कृत मौलिक रचना
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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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