बेटियाँ

जमा कर पैर रखना राह कंकडों से सभलना है
अकेले जिन्दगी की इस डगर पर आज बढ़ना है

बड़े ही लाड़ से जो बेटियाँ पलती पिता की जब
सिखा देना जमाने से लड़ाई आज लड़ना है

मिले तालीम उनको हर विधा की रोज अपनों से
किसी भी बात महिलाओं न अब तुमको झिझकना है

सदा इतिहास यह उनको बताता ही रहा अब तक
कि मर्यादा कभी भंग हो तभी दुश्मन कुचलना है

हदें जब पार कर जाए कमीने साथ उनके तब
उठा कर हाथ में शमशीर तब उनको खड़कना है

सुकोमल और नाजुक सी दिखाई वो हमें देती
तभी उनको समझ से काम लेकर ही निवटना है

परेशां वो न होगी अब दरिन्दों से कभी भी वो
उसे तैयार रहने के लिए नव सोच रखना है

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Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

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