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बेटियाँ

डॉ मधु त्रिवेदी

डॉ मधु त्रिवेदी

कविता

January 17, 2017

जमा कर पैर रखना राह कंकडों से सभलना है
अकेले जिन्दगी की इस डगर पर आज बढ़ना है

बड़े ही लाड़ से जो बेटियाँ पलती पिता की जब
सिखा देना जमाने से लड़ाई आज लड़ना है

मिले तालीम उनको हर विधा की रोज अपनों से
किसी भी बात महिलाओं न अब तुमको झिझकना है

सदा इतिहास यह उनको बताता ही रहा अब तक
कि मर्यादा कभी भंग हो तभी दुश्मन कुचलना है

हदें जब पार कर जाए कमीने साथ उनके तब
उठा कर हाथ में शमशीर तब उनको खड़कना है

सुकोमल और नाजुक सी दिखाई वो हमें देती
तभी उनको समझ से काम लेकर ही निवटना है

परेशां वो न होगी अब दरिन्दों से कभी भी वो
उसे तैयार रहने के लिए नव सोच रखना है

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डॉ मधु त्रिवेदी
डॉ मधु त्रिवेदी प्राचार्या शान्ति निकेतन कालेज आगरा स्वर्गविभा आन लाइन पत्रिका अटूट बन्धन आफ लाइन पत्रिका झकास डॉट काम जय विजय साहित्य पीडिया होप्स आन लाइन पत्रिका हिलव्यू (जयपुर )सान्ध्य दैनिक (भोपाल ) सच हौसला अखबार लोकजंग एवं ट्र... Read more
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