.
Skip to content

बेटियाँ

अरविन्द अवस्थी

अरविन्द अवस्थी

गीत

January 10, 2017

बेटी बचाइये!बेटी बचाइये!!

बेटी से सृष्टि चलती
नव सभ्यता पनपती
दो-दो कुलों में बनकर
दीपक की लौ चमकती
बेटी पराया धन है
मन से निकालिए। बेटी बचाइए!
बेटी से घर चहकता
आँगन भी है महकता
बेटी है गंगा -जमुना
ममता का जल है बहता
बेटे से कम न बेटी
यह बात मानिए! बेटी बचाइए!
थी लक्ष्मीबाई बेटी
थी कल्पना भी बेटी
इतिहास रच रही है
हर क्षेत्र में ही बेटी
बेटी का बाप बनकर
सम्मान पाइए!बेटी बचाइए!
बेटी अगर मरेगी
संख्या अगर घटेगी
बेटे के हित बहू फिर
बोलो कहाँ मिलेगी
संसार एक उपवन
कलियाँ खिलाइए!बेटी बचाइए!

Author
अरविन्द अवस्थी
उ प्र के इलाहाबाद जनपद के गाँव कठौली में एक जनवरी1962 को जन्म। बचपन से रंगमंच और साहित्य में रुचि। पेशे से अध्यापक। कविता, कहानी, गीत, लघुकथा, समीक्षा, लेख और साक्षात्कार पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित। मेरे गाँव की धूप"... Read more
Recommended Posts
बेटी को आगे बढ़ने दो
बेटी को आगे बढ़ने दो पढ़ने दो इसे पढ़ने दो, बेटों को जो सुख साधन दिये बेटी इससे वंचित क्यों ? बेटी को आगे बढ़ने... Read more
बेटी
साल अठारह गुजरे जब से मेरे घर मे आई बेटी जीवन की फुलवारी बनकर, घर आंगन मे छाई बेटी महक उठी जीवन की बगिया नन्ही... Read more
बेटी
साल अठारह गुजरे जब से मेरे घर मे आई बेटी जीवन की फुलवारी बनकर, घर आंगन मे छाई बेटी महक उठी जीवन की बगिया नन्ही... Read more
बेटी
ताटंक छंद में 1 बेटी नहीं किसी से कम हैं बेटी जग की माया है बेटा यदि है धूप घरों की बेटी घर की छाया... Read more