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बेटियाँ

Pradeep Bhatt

Pradeep Bhatt

कविता

January 10, 2017

बेटियां

बेटियां आज भी ये हुनर ले के चलती हैं
लाख गम हो मगर वो मुस्कुरा के चलती हैं

कब समझता जहां ये आँसुओं की कीमत है
बस रहे मौन कितने जख्म ले के चलती है

प्यार की बात माँ की न कभी भूली होगी
दूर रह कर वही बस याद ले के चलती है

आँसुओं को छिपाकर ही सदा हंसती है वो
ये हुनर बेटियां ही आज ले के चलती हैं

इस जहां के सभी फर्ज वो निभाये जाती है
कौन उस के सिवा ये राह ले के चलती है

जीवनी का चक्र मुमकिन कहां उन के बिन है
कोख मे ही भला क्यों जान दे के चलती है

प्रदीप भट्ट ,दिल्ली

Author
Pradeep Bhatt
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