Mar 3, 2017 · कविता
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नये साल आये, नये साल बीते।

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नये साल आये,
नये साल बीते।
ना जाने कितने
ही फ्लाइओवर के नीचे,
बिना कंबल, रजाई के,
ठंड से ठिठुरते।
पेट-पीठ एक
ना हो इसके,
इसी जुगाड़ में
समय बिताते।
इनके लिये
क्या नया साल?
क्या पुराना साल?
क्या जश्न मनाना,
क्या पर्व-त्योहार?
ये हैं बेघर लाचार,
क्यो नहीं इनपर
ध्यान देती सरकार?
—लक्ष्मी सिंह ?☺

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लक्ष्मी सिंह
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MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is... View full profile
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