बुद्ध पूर्णिमा और भगवान बुद्ध का जीवन परिचय --आर के रस्तोगी

बुद्ध पूर्णिमा को बैशाख पूर्णिमा भी कहते है क्योकि यह त्यौहार हिंदी माह बैशाख की पूर्णिमा को मनाया जाता है | यह गौतम बुद्ध जी की जयंती भी है और उनका निर्माण दिवस भी है | इसी दिन भगवान बुद्ध को ज्ञान की भी प्राप्ति हुई थी | आज बौद्ध धर्म को मानने वालो की संख्या लगभग 50 करोड़ से अधिक है जिसे सारे विश्व में मनाया जाता है ,विशेषकर चीन ,जापान ,नेपाल, तिब्बत और भारत | हिन्दू धर्म के मतानुसार भगवान् बुद्ध को विष्णु भगवान् के नवे अवतार भी माने जाते है | अत: यह हिन्दुओं के लिये भी यह दिन पवित्र माना जाता है |
गौतम बुद्ध जी का जन्म नेपाल की तराई में स्थित कपिलवस्तु के लुम्बिनी ग्राम में शाक्य क्षत्रिय कुल में 563 ई.पू.में हुआ था। इनका बचपन का नाम सिद्धार्थ था | इनकी माता का नाम महामाया और पिता का नाम शुद्धोधन था | इनके जन्म के सात दिन के बाद इनकी माता का देहांत हो गया था ,इसलिए सिद्धार्थ का लालन-पोषण इनकी माता प्रजापति गौतमी ने किया था |
16 वर्ष की अवस्था में सिद्धार्थ का विवाह शाक्य कुल की कन्या यशोधरा से हुआ । यशोधरा का बौद्ध ग्रंथों में अन्य नाम बिम्ब, गोपा, भद्कच्छना भी मिलता है। सिद्धार्थ से यशोधरा को एक पुत्र हुआ जिसका नाम राहुल था|। सांसारिक समस्याओं से व्यथित होकर सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की अवस्था में गृह त्याग दिया । इस त्याग को बौद्ध धर्म में महाभि-निष्क्रमण कहा गया है।

गृहत्याग के बाद सिद्धार्थ अनोमा नदी के तट पर अपने सिर को मुङवा कर भिक्षुओं का काषाय वस्त्र धारण किया। सात वर्ष तक सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में इधर उधर भटकते रहे सर्वप्रथम वैशाली के समीप अलार क़लाम (सांख्य दर्शन के आचार्य) नामक संयासी के आश्रम में आये। इसके बाद उन्होंने उरुवेला (बोधगया) के लिए प्रस्थान किया,जहाँ उन्हें कौडिन्य सहित 5 साधक मिले।

6 वर्ष तक अथक प्रयास के बाद तथा घोर तपस्या के बाद 35 वर्ष की आयु में वैशाख पूर्णिमा की रात पीपल वृक्ष के नीचे निरंजना (पुनपुन) नदी के तट पर सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्ञान प्राप्ति के बाद ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुये |

उरुवेला से बुद्ध सारनाथ (ऋषि पत्तनम एवं मृगदाव) आये यहाँ पर उन्होंने पाँच ब्राह्मण संन्यासियों को अपना प्रथम उपदेश दिया, जिसे बौद्ध ग्रन्थों में धर्म – चक्र-प्रवर्तन नाम से जाना जाता है। बौद्ध संघ में प्रवेश सर्वप्रथम यहीं से प्रारंभ हुआ।

महात्मा बुद्ध ने तपस्या एवं काल्लिक नामक दो शूद्रों को बौद्ध धर्म का सर्वप्रथम अनुयायी बनाया गया | बुद्ध ने अपने जीवन के सर्वाधिक उपदेश श्रावस्ती में दिये । उन्होंने मगध को अपना प्रचार केन्द्र बनाया।बुद्ध के प्रसिद्ध अनुयायी शासकों में बिम्बिसार, प्रसेनजित तथा उदयन थे। बुद्ध के प्रधान शिष्य उपालि व आनंद थे। सारनाथ में बौद्धसंघ की स्थापना हुई।

महात्मा बुद्ध अपने जीवन के अंतिम पङाव में हिरण्यवती नदी के तट पर स्थित कुशीनारा पहुँचे। इसे बौद्ध परंपरा में महापरिनिर्वाण के नाम से भी जाता है।

मृत्यु से पूर्व कुशीनारा के परिव्राजक सुभच्छ को उन्होंने अपना अंतिम उपदेश दिया था |महापरिनिर्वाण के बाद बुद्ध के अवशेषों को आठ भागों में विभाजित किया गया।

राम कृष्ण रस्तोगी

गुरुग्राम (हरियाणा )

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