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बुढ़ी आखों को रोशनी ना दो सही, पर एक सहारा तो जरूर देना

बुढ़ी आखों को रोशनी ना दो सही, पर एक सहारा तो जरूर देना

हर खुशी को त्याग देना, खुद तो दर्द सहकर उन्हे खुशीयोंं का दामन देना, हर लड़ाई में साथ देना, दर्द को अपने साये में सिपट लेना, यह आस पुरी होने का सपना हर माता-पिता अपनी आंखों में संजोते है…? वो एक आस को लेकर की वहीं फिर उनके बुढ़े होने पर उनका आसरा बनेगा, अपने लिए कुछ खुशी ना हो तो कोई बात नही, लेकिन अपनी औलाद को अपने ज्यादा से ज्यादा प्रयास कर हर एक तमन्ना देते है। लेकिन इन सब अहसानों को हर कोई औलाद नही देख पाती है। और उन्हें मिलने वाली हर खुशी को अपना हिस्सा समझ कर मौज-मस्ती करने लगते है। मगर वो औलाद भुल जाती है, कि जो खुशी उन्हे मिल रही है, वह खुशी उनके हिस्से में नही होती। वो तो हर खुशी लुटा देना वाला एक बाग होता है, और वो है – माता-पिता…..। जिसमें हम फूल की तरह हर पल खिलते रहते है।

हर सांस की ड़ोर अपने नाम कर देें, हर दु:ख अपने नाम कर दें,
हर माता-पिता तो हसते-हसते हर खुशी हम पर कुर्बान कर दें…।।

हमने कभी ये नही सोचा कि हमारें माता-पिता ने अपने जीवन को किस तरह बिताया, या उनकी जींदगी मे उनके क्या-क्या अरमान रहें, वो पूरे हुए या नही, कुछ सपने बरसों बाद भी अधूरे रह गये तो क्यों, इन सभी बातों को जिस बेटे ने सोच लिया या इनका जवाब तलाशने की कोशिश की हो। मानों वह बेटा अपने जीवन में अपने माता-पिता से मिली हर खुशी का कर्ज चुकाएगां, और अपने जीवन के हर क्षण सर्घष मेें बिता कर मां-बाप के सपनों को पुरा करेगा।
माता-पिता के सपने, अपने बच्चों की खुशी के लिए अधुरे रह जाते है।

हम सोचते है कि हमारी खुशीयां हमें मिल रही है, लेकिन ये हमेशा याद रखना कि हमें जो मिल रही है वो खुशी वह है, जो अपने लिए माता-पिता ने रहने दी है। अपने बच्चों के लिए वह उनकी खुशियां अधुरी रहने देते है। जब हर खुशियों पलकर जब बेटा बड़ा हो जाता है और अपनी जींदगी के फैसले खुद लेने लग जाता है। तो मां-बाप सोचते है चलो बेटा खुद अपने पांव पर खड़ा हो गया है। लेकिन इनके बीच के फासले में बेटे अपने मां-बाप को कुछ पुछना तो ठीक, उनको कुछ खबर हो जाने के डऱ से डऱते है। कुछ के तो दिन बुरे आ जाते है, फिर वह सोचता है मेरे द्वारा किये गये इन गलत कामों को अपने मां-बाप को कैसे बताऊ…, यही सोचते-सोचते जो बाकि होता है वह भी खो देता है। लेकिन फिर वहीं माता-पिता ही अपनी खुशियों को अधुरा छोडक़र अपने बच्चों कि खुशी के लिए लड़ते रहते है। और अपनी आंकाशाओं को खतम कर अपने बच्चे के दु:ख को मिटा देते है। फिर वहीं बेटे उन मां-बाप के बुढ़े होने पर उनका आसरा, सहारा नही बनते और अपने जीवन की खुशियां ढुढ़ते है। लेकिन वो यह याद नही रखते कि जो आज तुम हो, वो अहसान इन्ही बुढ़े माता-पिता की वजह से हो, जब तक ये बेटे ये समझ पाये तब तक वो अपने मां-बाप को खो देते है। जीवन में अपने द्वारा किये गये पाप को मिटाने का मौका अपने माता-पिता की आंखे धुधली हो जाए, तो हमें लाठी का सहारा और उनके लिए जीने का आसरा बनना चाहीए…।। -मनीष कलाल-
उन आंखों की रोशनी बन जाओं, जिन आंखों ने आपके लिए ही सपने देखें है..।।
-मन, मनीष कलाल
डूंगरपुर, राजस्थान
8003315586

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