बुढ़ापे की व्यथा

बीता है मधुमास,उम्र थमी, सब संगी साथी छूटे हैं
नेह सिंचित, श्रम अवलम्बित, सभी घरोंदे टूटे है
नेत्र ज्योति क्षीण पड़ी, सब जोड़ सिकुड़ कर ऐंठे हैं
चलने की सामर्थ्य रही नहीं, खाट पकड़ कर बैठे हैं
धोकनी जैसे साँस है चलतीं, खाया न पिया जाता है
बीमारी से दुनिया सिमट गई, मिलने से कतराता है
दूसरा बचपन है बुढ़ापा, दुसरो की मदद पे जीते हैं
हरदम झिड़की सहते हैं, हरपल जहर हम पीते हैं
हाथ काँपते, पैर हैं दुखते, गर्दन हरपल हिलती है
कुत्ते ज्यू बासी बची हुई, रोटी खाने को मिलती है
मुंह में दाँत न पेट आंत, चेहरे पर झुर्रियां भरी पड़ी
सब अरमान हुए हैं ठंडे, सब आशाए सुप्त पड़ी
बोझ मानती वो संताने, जिनको पाला पोसा है
बेटे ले जाते वृद्धाश्रम, बहुओ ने अक्सर कोसा है
फिर भी यह दुआ मांगते, परिवार तुम्हारा फूले फले
जितनी विपदा आए बच्चों पर, गम वो सारे हमे मिले

Like 1 Comment 0
Views 869

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share