Skip to content

बुझे हुए हैं दीए तमाम मुनव्वर कर दे…………..

suresh sangwan

suresh sangwan

गज़ल/गीतिका

November 26, 2016

बुझे हुए हैं दीए तमाम मुनव्वर कर दे
हसरतों को मोहब्बत का समंदर कर दे

रंग-ओ-खुश्बू को मेरा हमसफ़र कर दे
ज़िंदगी को अपनी याद से मो अतर कर दे

आसमाँ पे रहनेवाले सुन लो सदाएं
मुझे जो भी देना है नीचे उतरकर दे

रंग जम जायेगा महफ़िल में आज उनकी
सुर्खी से रुखसार को तर-बतर कर दे

अर्ज़ है तू उल्फ़त में बस इतना भर कर दे
ख़बर मेरी ले ना ले अपनी ख़बर कर दे

सुना है इक सिक्के के पहलू हैं ए खुदा तो
खुशी के दिन लंबे गम के मुख़्तसर कर दे

इश्क़ की बरसात मुझे भी तर बतर कर दे
नाम की मेरे शब-ए-वस्ल मुक़र्रर कर दे

अहसान इतना सा मिरे ए हमसफ़र कर दे
मुहब्बत के दरिया का तू समंदर कर दे

जाग जाए इश्क़ दिल में उनके ए ख़ुदाया
सुखन मिरा तू इस हद तक़ पुर असर कर दे

Suresh sangwan ‘saru’

Share this:
Author
suresh sangwan

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग से अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

साल का अंतिम बम्पर ऑफर- 31 दिसम्बर , 2017 से पहले अपनी पुस्तक का आर्डर बुक करें और पायें पूरे 8,000 रूपए का डिस्काउंट सिल्वर प्लान पर

जल्दी करें, यह ऑफर इस अवधि में प्राप्त हुए पहले 10 ऑर्डर्स के लिए ही है| आप अभी आर्डर बुक करके अपनी पांडुलिपि बाद में भी भेज सकते हैं|

हमारी आधुनिक तकनीक की मदद से आप अपने मोबाइल से ही आसानी से अपनी पांडुलिपि हमें भेज सकते हैं| कोई लैपटॉप या कंप्यूटर खोलने की ज़रूरत ही नहीं|

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you