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बीती बातें

Naval Pal Parbhakar

Naval Pal Parbhakar

कविता

April 8, 2017

बीती बातें

आज जब मैं
अपने पुराने दिनों की
यादें ताजा करने को
स्कूल की चाहरदीवारी
के अन्दर जब दाखिल हुआ
तो दंग मैं रह गया
यकायक ……..आंखें
चूंध गई
मुझे पल को तो
ऐसा लगा कि…..
मैं किसी ओर जगह आ गया
क्योंकि ……………
मैंने जहां शिक्षा ली थी
वो ओर स्कूल था।
भले ही गेट वो पुराना था
मगर स्कूल अन्दर से
बदल चुका था।
न वो विज्ञान कक्ष था
न वो पानी की टंकी थी
न वो शिक्षा थी
न वो शिक्षार्थी थे
न वो शिक्षक थे ।
न वो चपरासी था।
वहां थी तो बस
वही शहरी आबो-हवा
मैदान भी बस तिल-भर
शिक्षक कठपुतली फैशन की
ढाल तन को फैशन में अपने
शिक्षा देते युग प्राचीन की
याद दिलाते गांधी का भाषण
पहनों सूती कात के वस्त्र
धारण करो तुम तन पे खादी
गांधी ने बहिष्कार किया
इन नये-नये कपड़ों का
जला दी थी इनकी होली
पर वो शिक्षक ये नही जानते
क्या वो बलिदान था ?
जब हम बच्चों का जन्म हुआ
स्वतंत्र देश का हर बच्चा
अंग्रेजों की गुलामी से स्वतंत्र था
खेलने का बढ़ने का
अग्रसर अपने पथ पर होने का
हर किसी का हक है।
पढो, बढो तरक्की करो
ओर दुनिया पर छा जाओ
मगर दुनिया की कालिमा को
अपने दिलों पे मत छाने दो
सीखो कुछ दूसरों से
उनकी गंदगी, अधूरा फैशन
दिनचर्या में न आने दो।
-ः0ः-
नवल पाल प्रभाकर

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