बिरह का पंछी!!

तुम्हारे बिरह की श़मा में जल रहा हूँ,
तुम्हारी यादों के संग-संग चल रहा हूँ !
ख़लने लगा हूँ अब दोस्तों को अपने,
सोचते हैं वे कि मैं बेढंग चल रहा हूँ !

मोहब्बत-ए-खत इज़हार कर रहा हूँ,
तड़पन है दिल से इकरार कर रहा हूँ!
आलोकता चकोर, चाँद आसमान में ,
याद में सही प्यार बेशुमार कर रहा हूँ!!

लिखूँ कैसे खत अनंत याद के पुलिंदे,
यूँ सोच लो बस फरियाद में हैं ज़िन्दे!
आओगी तुम फिर बुलाओगी मिलने,
बस इक इसी इंतज़ार में पल रहा हूँ !

सहूँ कब तलक मैं असह्य ताने-बाने,
कुरेदते हैं सब बेवज़ह जाने-माने!
जाने और कितना तड़पाओगी तुम,
दूर-ए-अनल दिल-जान जल रहा हूँ !

तन की खबर है ना मन का पता है,
मालूम न मुझ को हुई क्‍या खता है !
पंछी बिरह का जहाज-ए-समंदर,
पूरब से पश्चिम विहार कर रहा हूँ!

दिल-ए-जहाँ में ले आशा की किरणें,
वन-वन विचरण करती मन की तरंगें!
पावस पतंगा मेहमान ज्यों ‘मयंक’,
सावन-फुहार बेज़ुबान जल रहा हूँ !

‌‌रचयिता : के.आर.परमाल ‘मयंक’
[धारपुरा, होशंगाबाद {म.प्र.}]

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