Aug 16, 2016 · मुक्तक
Reading time: 1 minute

बिटिया चल,,,,

बिटिया मेरा बचपन है
मेरा अधूरा ख्वाब है
आँखे तेरी ख़्वाब मेरा है।

चल आगे बढ़
पा वो आसमाँ सी मंजिल
जिसे मैंने देखी थी पर पा न सकी।

अब मेरी शक्ति तेरी है
बिटिया चल आगे बढ़
तोड़ दे वर्जनायें जिनमे मुझे सदियों से जकड़े हैं।

हटा दे वो सड़ी गली परमरायें
जिनसे मेरी सांसे घुटती हैं।
बिटिया चल साँस लें खुली हवा में
अब घर में दम घुटता है।
“””लक्ष्य”””

9 Views
Copy link to share
Lakshya thakur
9 Posts · 121 Views
मेरी रचनाएँ दिल से निकलती हैं जिनमें काव्यशिल्प से ज्यादा भावों का जोर होता है।यहाँ... View full profile
You may also like: