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“बिटियाँ . . .”

Pradipkumar Sackheray

Pradipkumar Sackheray

गज़ल/गीतिका

January 29, 2017

रब का अनमोल वरदान बिटियाँ हैं |
ज़ैसे की, तुफ़ान से टकराता दिया हैं |

रिश्तों के ध़ागें तो अक़्सर बिख़र ज़ाते,
मगर, दो परिवारों को ज़िसने सिया हैं |

प्यार के किस्से तो बड़े शौक से सुने ज़ाते,
इन बेटियों से ही तो प्रेमीयों की प्रिया हैं |

समज़ – समज़ कर समज़ सको तो,
रब की पैंगाम भिज़वाती चिठ़ियाँ हैं |

गर्भपात करनेवालों अभी तो सुध़रो,
लड़की नहीं, तो लड़के देंगे किसे ज़िया हैं?

ज़ब बेटि ही नहीं, तो फ़िर पापा कैसे?
फ़िर, पापाओं की कौंन बनेगी परियाँ हैं?

ओ माट़ी के पुतलो अब तो होश में आओ,
बेटियाँ ही तो सोने की रानी गुड़ीयाँ हैं |

यहाँ बातें तो होती बड़ी परंपराओं की,
बेटि से ही माथें की बिंदी और चुड़ीयाँ हैं |

✍? प्रदिपकुमार साख़रे
?+917359996358.

Author
Pradipkumar Sackheray
Pr@d!pkumar $ackheray (The Versatile @rtist) : - Writer/Poet/Lyricist, Mimicry Artist, Anchor, Singer & Painter. . .
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