"बिटियाँ . . ."

रब का अनमोल वरदान बिटियाँ हैं |
ज़ैसे की, तुफ़ान से टकराता दिया हैं |

रिश्तों के ध़ागें तो अक़्सर बिख़र ज़ाते,
मगर, दो परिवारों को ज़िसने सिया हैं |

प्यार के किस्से तो बड़े शौक से सुने ज़ाते,
इन बेटियों से ही तो प्रेमीयों की प्रिया हैं |

समज़ – समज़ कर समज़ सको तो,
रब की पैंगाम भिज़वाती चिठ़ियाँ हैं |

गर्भपात करनेवालों अभी तो सुध़रो,
लड़की नहीं, तो लड़के देंगे किसे ज़िया हैं?

ज़ब बेटि ही नहीं, तो फ़िर पापा कैसे?
फ़िर, पापाओं की कौंन बनेगी परियाँ हैं?

ओ माट़ी के पुतलो अब तो होश में आओ,
बेटियाँ ही तो सोने की रानी गुड़ीयाँ हैं |

यहाँ बातें तो होती बड़ी परंपराओं की,
बेटि से ही माथें की बिंदी और चुड़ीयाँ हैं |

✍? प्रदिपकुमार साख़रे
?+917359996358.

This is a competition entry

Competition Name: साहित्यपीडिया काव्य प्रतियोगिता- "बेटियाँ"

Voting is over for this competition.

Votes received: 23

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

साहित्यपीडिया पब्लिशिंग द्वारा अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें सिर्फ ₹ 11,800/- रुपये में, जिसमें शामिल है-

  • 50 लेखक प्रतियाँ
  • बेहतरीन कवर डिज़ाइन
  • उच्च गुणवत्ता की प्रिंटिंग
  • Amazon, Flipkart पर पुस्तक की पूरे भारत में असीमित उपलब्धता
  • कम मूल्य पर लेखक प्रतियाँ मंगवाने की lifetime सुविधा
  • रॉयल्टी का मासिक भुगतान

अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- https://publish.sahityapedia.com/pricing

या हमें इस नंबर पर काल या Whatsapp करें- 9618066119

Like Comment 0
Views 237

You must be logged in to post comments.

Login Create Account

Loading comments
Copy link to share