" बिखर बिखर गये अरमान " !!

तिनके तिनके बिखरे सपने ,
बिखर बिखर गये सामान !
आज चली फिर ऐसी आंधी ,
हम निर्बल समय बलवान !!

दो गज़ धरती अगर मिली तो ,
पर्ण कुटीर बना डाली !
खटक रही थी कुछ आंखों को ,
रातों रात गिरा डाली !
फिर धरती अब बनी बिछौना ,
आश्रय देगा आसमान !!

खाली हाथ लिये आये हम ,
अकसर हाथ रहे खाली !
मेहनत तो जी भर करते हैं ,
किस्मत देती है ताली !
खुद को बांधें आखिर कितना ,
बिखर बिखर गये अरमान !!

चिंता किसे हमारी जानो ,
केवल एक भरतार है !
यहाँ अनसुनी सब करते हैं ,
सुनता बस करतार है !
आँसू तो झरझर बहते हैं ,
औ परायी है मुस्कान !!

किसे लकीरें पढवाऐं जी ,
हमें दिखी ना रेख कहीं !
पैदा होने से अब तक जी ,
जाने कितनी चोंट सही !
आज नहीं तो कल बदलेगा ,
अदल बदल करे दिनमान !!

स्वरचित / रचियता :
बृज व्यास
शाजापुर ( मध्यप्रदेश )

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