कविता · Reading time: 1 minute

बाल श्रमिक

फटे अधर, नयनाश्रु लिये कहा बालमन,
सुन माँ धरणी, सुन पिता गगन ।
है क्या मेरा निर्छिन्न अपराध अपार,
श्रमिक पांत खड़ा हूँ विवश लाचार।
हुई ईश्वर की ऐश्वर्यशक्ति आज क्षीण,
दिया पिता दीन कहीं वह भी लिया छीन।
बिन भोजन क्या है धैर्य जीवन आधार,
जाऊँ किधर? भुख लिये किस -किस द्वार।
चट्टान बन खड़ा यहाँ निर्दयी अहंकारी समाज,
मानवता क्या नैतिकता भी नहीं अवशेष आज।
अहंकार तले शिशु को भी रौंद डाला उसने,
मुठ्ठी भर दाना दे, मजबूर मजदूर की संज्ञा दी है जिसने।
हम निज सम्मुख कहीं न उस समृद्ध पौरुष को पाऊँ,
तरपित उदर, विध्वंस उर, जलाश्रित नेत्र जिसे दिखाऊँ।
ईश्वर का क्या? उगना बने विद्यापति गृह मजदूर,
हुई जब असहनीय, अदृश्य हो चले कहीं दूर।
बालक को हार-मांस सह पेट देकर बनाया सशरीर,
व्याकुल पेट, जग क्या रहा, रहेगा कोई स्थीर।
हेअंबरअवनि! संसार को कर क्षणिक मानवता का बोध,
अपना क्या पराया, है जग का सब बच्चा बालबोध।
छू लेने दे श्वप्न लोक के असंख्य तारे,
अंबुदमाल पहन मेघयान पर उड़ जाए चाहे सारे।
कौतुक हृदय लिये पुष्प पुष्प पर चित्रपतंगा,
स्वछंद उपवन में डाली डाली बैठ गाए राग विहंगा।
है यदि तु मानव, मानववृति का कर आंकलन,
मुझ सा शिशु का न नीरस कर मेरा बचपन – – -क्रमशः

–उमा झा

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