बाल चुभे तो पत्नी बरसेगी बन गोला/आकर्षण से मार कांच का दिल है भामा

( मुक्त छंद)

नायक” दाढ़ी मुडा कर, मूँछ घोटना आप|
निश्चय ही बड़ जाएगी, इज्जत रूपी माप ||
इज्जत रूपी माप बढ़ायी श्रीराम ने|
मूँछ कबहुँ न रखी,दिव्य शिव-हनूमान ने ||
कह “नायक” कविराय, मूँछ तज बन अति भोला|
बाल चुभे तो पत्नी बरसेगी बन गोला||

इसीलिए मूँछें तजीं ,आप व्यर्थ हैरान |
लेखक से कवि बन गया,मेरे दिल का ज्ञान||
मेरे दिल का ज्ञान, हुआ आधा, पुनि आधा|
किंतु गृहस्थी की गाड़ी में नहिं है बाधा||
कह “नायक” कविराय, फाड मत स्वयं पजामा |
आकर्षण से मार, कांच का दिल है भामा ||

बृजेश कुमार नायक
“जागा हिंदुस्तान चाहिए” एवं “क्रौंच सुऋषि आलोक” कृतियों के प्रणेता

-दिव्य=प्रकाशमान्
-शिव =महादेव (अष्टमूर्ति के अंतर्गत यह सोम-मूर्ति
तथा ब्रह्मस्वरूप हैं)
-भोला=सीदा-सादा
-भामा=स्त्री(पत्नी)
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जनपद के समस्त अधिकारी बंधुओ, साहित्यपीडिया सहित अन्य समस्त साहित्यकारों, ,पत्रकारों एवं समस्त पाठक बंधुओ को पावन पर्व होली की अनंत हार्दिक शुभकामनाएं|
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