बाल कविता

“आँगन में भर आया पानी”

छुटकी आओ….मुन्नी आओ
झम-झम करती….बारिश आई
ताता-थैय्या….शोर मचाओ
मौज मनाने….की रुत आई।

कागज़ की हम….नाव बनाएँ
आओ करते….हैं मनमानी
उछलें-कूदें….गोते खाएँ
आँगन में भर….आया पानी।

रंग-बिरंगे….छातों से हम
पेड़ परिंदे….बन उड़ जाएँ
इच्छाओं के….पंख लगाकर
आसमान में….दौड़ लगाएँ।

अंतरिक्ष ने…. सात रंग का
रूप सलौना….दिखलाया है
शेर-शेरनी….ब्याह रचाते
सावन मौसम….मन भाया है।

नीम तले हम….झूलें झूला
बन किलकारी….आँगन चहकें
पेंग बढ़ाकर….गगन चूमते
बिसरा मजहब….उपवन महकें।

डॉ. रजनी अग्रवाल ‘वाग्देवी रत्ना’
वाराणसी (उ. प्र.)
संपादिका-साहित्य धरोहर

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