बालक मजदूर

देखा पथ पर ।
मजदूरो का जत्था ।
चिलचिलाती धूप मे ।
करते रहे थे काम ।
सोच रहे थे ।
काम करे की आराम करे ।
इस तपती दोपहरिया मे ।
वो तो कर रहे ढलाई ।
बन रही छोटी परछाई ।
करते वे किसके लिए ।
अपने लिए और परिवार के लिए ।
मजबूरी का नाम मजदूरी ।
और नही है कुछ भी जरूरी ।
देख चकित हुआ मजदूरो के ।
मध्य एक छोटा सा बालक था ।
उठती थी न तनिक भी माल ।
वो तो बेचारा था बेहाल ।
कौन भेजा रे ! रे !
इस बालक को ऐसे हाल ।
हे प्रभु तेरी कैसी ये दुनिया ।
कैसा यहाँ पर होता न्याय ।
मार्तण्ड तपता जा रहा ।
मजदूर खटते जा रहे ।
हो गया बेहोश वो बालक ।
करके मेहनत बेहद हलाक ।
श्वास बढने थी लगी ।
दिल धङकने लगा ।
बेचारा वह बालक ।
हदसने लगा ।
थी वह जगह पुरी वीरान ।
न था वहाँ पर कोई तरू खड़ा ।
पानी भी न था ।
तरस गया वो पानी -पानी कहते-कहते ।
और उसी वक्त तोङ दिया उसने अपना दम ।
ठीक ही कहां गया ।
ठीक न किसी की भी अति ।
था वो बालक पढने द्रुत ।
पर थी गरीबी लाचारी की सांया ।
पिताजी नही थे सिधार गए थे ।
छोङ उसे जन्म मे ही ।
कापी, किताबो के लिए कर रहा था काम ।
कुछ पढ आगे बढे कर रहा उसका इंतजाम ।
मजदूरो ने काम को छोङा ।
उसके लेकर घर को दौङा ।
माता सुनी जब ऐसी बात ।
निकल गया कलेजा रह गई दिल थाम ।
खाकर गश्ती गिर गई ।
मुंह से निकला राम ।
मां -बेटो की हो गई यही पर ।
कहानी समाप्त ।
हे ! ईश्वर एक फरियाद आपसे ।
कुछ भी कर पैदा गरीब न कर ।
दाने -दाने के लिए हमको मोहताज न कर ।
अमीर सोचता है कि ।
कौन -सी दवा खांए की भूख लगे ।
गरीब सोचता है भूख लगे तो क्या खाए ।
हाय रे! भगवान् तुमने ये कैसे चक्रव्यूह बनाए ।

⏰🔯Rj Anand Prajapati ⏰🔯

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