बार-बार - गज़ल/गीतिका - डी के निवातिया

बार-बार

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वो कौन है जो दिल को दुखाता है बार-बार !
अश्क बहते नहीं दिल कराहता है बार-बार !!

वफ़ा संग बेवफाई दस्तूर पुराना है जमाने का
फिर क्यों दास्ताँ जमाने को सुनाता है बार बार !!

जी भर के खेला है, मनमर्जी तोडा मरोड़ा है,
बड़ी संगदिली से रिश्ता निभाता है बार-बार !!

वो सितम करे,या रहम करे, किसे परवाह है
कुछ बात है जो दर्द-ऐ-दिल भाता है बार बार !!

“धर्म” को भी जिद है फना हो तो उसी के हाथ हो
इश्क में जां लुटाने में, मज़ा आता है बार बार !!

!

डी के निवातिया

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