कविता · Reading time: 1 minute

बारिस

क्याे इस बरस, रही हाे इतनी बरस,
बहुत हुआ,बरसकर अब मत बरस,
नही बरसती ताे तरसते, इस बरस,
बरसाकर तरसा रही हाे, इस बरस,
नही भूले बारिस जाे हुई पिछले बरस,
आंसू नही सूखे जाे मिले पिछले बरस,
नहर नहर लहर लहर हाे रही कहर कहर,
डगर डगर पहर पहर डूब रहे शहर शहर,
कड़क कड़क चमक चमक दामिनी दमके,
फड़क फड़क धड़क धड़क जिया धड़के,
सड़क सड़क पकड़ पकड़ किस ओर भटके,
गड्डे गड्डे बड़े बड़े भरे पड़े देते झटके,
।।।जेपीएल।।।

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Author
जे पी लववंशी, एमएससी (मैथ्स), एमए ( इतिहास, हिंदी, राजनीति विज्ञान) "कविता लिखना और लिखते लिखते उसी में खो जाना , शाम ,सुबह और निशा , चाँद , सूरज और…
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