Aug 29, 2016 · कविता
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बारिश की वे साँझें (स्मृति चित्र )

काली घटाएँ , साँझ , तेज हवायेँ और बारिश की फुहारें ।
छातों में सिमटते दामन बचाते लोग
उड़ते आँचल ,भीगते बदन तेज कदम लड़कियां ।
सड़क में गड्ढे ,गड्ढों में पानी छपा छप ।
बगल से गुजरती बाइक उछालती छपाक, मटमैला पानी ।
मढ़ैया के ऊपर छाये आम के पेड़ पर पक्षियों का कलरव ।
किसी घर के दरवाजे पर बच्चों को तकती माँ ।
किसी अटारी के झरोखे से झाँकती प्रतीक्षारत नायिका ।
नुक्कड़ के ढाबे पर खौलती चाय ,गर्म चाय की चुसकियों पर
बहसें और किस्से ।
उन किस्सों में कुछ किस्से हमेशा अधूरे रह जाते थे ।
और इंतजार होता फिर किसी वैसी शाम का ।
रात को तो घर लौटना ही होता था ,
सूखे या भीगते हुए ।

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