कविता · Reading time: 1 minute

बारिश का पानी

कुछ तो समझो ऐ मानव ,
मौसम का इशारा है |
वक्त बेवक्त की यह बारिश ,
यह बादल का फटना ,
यह पानी का विक्राल रूप और
यह तूफान , कुछ कह रहा है तुम्हे । सभी कुछ सामान्य नहीं ,
यह महामारी का पाँव पसारना ,
और इंसानों का सिकुड़ जाना ।
विज्ञान आधुनिकता की धज्जियाँ
उड़ जाना ,
कहते हैं समझदार को इशारा काफी है ,फिर क्यों न समझ पाये तुम ,
यह पानी का विक्राल रूप , यह तूफान और वक्त बेवक्त की यह बारिश ,
ना कागज की किस्ती ,
न बारिश का पानी ,
कुछ भी न लुभा रहा है हमें ,
बस सभी कुछ डरा रहा है हमें ।

कागज के यह नोट .
सचमुच कागज के ही हैं ,
कब समझ यह आयेगा ,
धरती माँ सचमुच एक माँ है .
और माँ का यह रूप ,
हमारी लालच का नतीजा है ।
आओ आज हाथ फैलाए
और अपनी धरती माँ से माफी माँगे, उनके पर्वत , नदियाँ , जंगल ,
सब कुछ उनको लौटा दें ,
और हर माँ की तरह ,
धरती माँ भी हमें , प्रेम से गले लगाये , और जीवन का वरदान दें
और रिमझिम बारिश की फुहार
खेतों को लहरा दें ,
और दे किसानों को वो मुस्कान ,
मासूम बच्चे फिर गा उठे,
वो बारिश का पानी , वो कागज की किस्ती , वो मस्ती का मौसम ,
वो दिल का संकू .
कुछ तो समझो ऐ मानव
मौसम का इशारा है ।

पूनम शर्मा

Competition entry: “बरसात” – काव्य प्रतियोगिता
4 Likes · 5 Comments · 64 Views
Like
1 Post · 64 Views
You may also like:
Loading...