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बाबुल की बिटिया

Balkar Singh Haryanvi

Balkar Singh Haryanvi

कविता

October 27, 2016

बाबुल के आंगन की चिडि़यां
ईक दिन तो तुझे उड़ जाना हे,
जिसके संग में खाई खैली
छोड़ उसी को जाना हे ,
महक रही उपवन की डाली
घर आंगन महकाना हे,
चाेतरफा हो उजियारा
दीपक कि तरह जल जाना हे,
हे मालिक तूं ये तो बता
क्या ये तेरा पैमाना हे,
जिसकी कोख से जन्म लिया
छोड़ उसी को जाना हे,
भर आए बाबुल के नैना
बिटिया को चले जाना हे,
बेशक भूले जग सारा
बाबुल को भूल ना जाना हे!
बलकार सिंह हरियाणवी*

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Author
Balkar Singh Haryanvi
गांव गोरखपुर जिला फतेहाबाद हरियाणा माेबाईल 9068690099
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