"बाबाजी का ठुल्लू "(हास्य व्यंग)

“बाबाजी का ठुल्लू “
(हास्य व्यंग “
मैने एक भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया।
और खूब जोर जोर से भाषण दिया।
भाषण देते हुए मुझे बहुत मज़ा आ रहा था।
और मेरे भाषण को लोगों द्वारा खूब सराहा जा रहा था।
मुझे ही नहीं मेरे भाषण को सुनकर लोगों को भी मजा आ रहा था।
और सारा का सारा हुज़ुम ताली बजा रहा था।
तालियों की गड़गड़ाहट पाकर मेरा हौसला बड़ा।
मैं मंच पर चार कदम आगे बढ़ा।
मैने धीरे धीरे अपने भाषण की आवाज़ बढ़ाई।
मैने देखा मेरा भाषण लूट रहा था खूब वाहवाही।
कुछ समय पश्चात मैं हो गया शांत।
क्योंकि मेरे भाषण का हो गया देहांत।
मेरे बाद सभी प्रतिभागीओ ने अपना अपना भाषण सुनाया।
सभी के भाषण को सुनकर बहुत मज़ा आया।
सभी ने अपने भाषण के लिए खूब तालियां पायी
सभी के भाषण ने लूटी खूब वाहवाही।
पर,जैसे घड़ी परिणाम की आयी। सबके चेहरों पर मायूसी छायी। जैसे ही परिणाम सुनाया।
मेरा पहला नंबर आया।
पहला नंबर पाकर के मैं खुशियों में झूम रहा था।
पैर जमीं पर नहीं थे मेरे मैं आसमां में घूम रहा था
पहला नंबर पाकर के बहुत मज़ा आ रहा था।
और पहला नंबर पाकर के मैं फूला नहीं समा रहा था।
मेरी सारी की सारी खुशियां उस समय मिट्टी में मिली।
जिस समय ईनाम की पोटली खुली।
ईनाम पाकर के मैं बन गया था उल्लू।
क्योंकि ईनाम में मिला था मुझको “बाबाजी का ठुल्लू “।

रामप्रसाद लिल्हारे
“मीना “

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