कुण्डलिया · Reading time: 1 minute

बादल की रेख

भारी बरखा है कहीं , बूँद तरसते लोग
सावन का क्या दोष है , सबके अपने जोग
सबके अपने जोग , बना चाहे सब राजा
भूल सनातन धर्म , काट डाले तरु ताजा
कह कवि नंदन देव , घिरे कैसे जलधारी
लुटा धरा – श्रृंगार , हुई पीड़ा मन भारी
देवकीनंदन

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