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*बात पनघट की*

mahesh jain jyoti

mahesh jain jyoti

गीत

October 10, 2017

ब्रज भाषा में एक रचना ….!
(पनघट पर एक नारी अपनी सखी से कह रही है अपने मन की बात । संदर्भ पुराना है ।गीत भी पुराना है ।अब तो पनघट ही नहीं रहे …….)
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*बात पनघट की*
————–
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।
अबकै बहना सूखौ परि गयौ ,
कैसी परवी परी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।

बैल बिकौ जब ब्याज चुकायौ ,
भैंस बेच कै नाज मँगायौ ,
भूखी गाय रँभावै कहाँ ते लाऊँ चरवी हरी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।1

दूध बिना रोवै है ललना,
छाती फटै परे है कल ना,
छोरी इक्कीसी पै आई आँख कंकरी परी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।2

राम निठुर है गयौ हमारौ,
काऊ कौ नाँय नैक सहारौ,
तीन दिना ते ताव बलम कूँ दवा न दारू करी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।4

बालक तरसैं हैं टूकन कूँ,
कैसै धीर धराऊँ मन कूँ,
रूखी हलक न चलै चपटिया गुड़ की रीती धरी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।5

कोउ मठा भी अब नाय देवै,
फटकारै गारी दै लेवै ,मुसकिल है गयौ जीनौ बहना ,जिंदी हूँ ना मरी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।6

साहुकार कौ सम्मन आयौ,
संग सिपाही झम्मन लायौ,
सिगरी धरती कुड़क भई ई कैसी बिजुरी परी ।
हँसुलिया मेरी गिरवी धरी ।।7
—–
-महेश जैन ‘ज्योति’
मथुरा ।
***
शब्दार्थ…..
हँसुलिया-गले का आभूषण, परवी-विपत्ति,
चरवी-हरा चारा,ललना-बेटा, ताव-बुखार , चपटिया-घड़ा , रीती-खाली, बिजुरी-बिजली

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Author
mahesh jain jyoti
"जीवन जैसे ज्योति जले " के भाव को मन में बसाये एक बंजारा सा हूँ जो सत्य की खोज में चला जा रहा है अपने लक्ष्य की ओर , गीत गाते हुए, कविता कहते और छंद की उपासना करते हुए... Read more

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