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बातचीत – पार्ट 1

(इस कहानी में बताए गए पात्र काल्पनिक है। )
‘आगे का कुछ सोचे हो’ “अनवर ने मासूमियत से फ़ोन पर पूछ लिया”
“इंदु” कुछ समय ख़ामोश रही और जवाब आया ‘क्या’ ?
शाम का वक़्त और सारा शहर जहां बंद की स्थिति में हो तो उससे मिल पाना नामुमकिन था ।
‘ख़्याल आया फ़ोन मिलाया जाए’
अक्सर हमारी बातें शुरू चाहे जहा से हो बात ‘फ्यूचर’ पा आ रुकती है ।
आज की बातें भी वही से शुरू हो रही थी ।
फ़ोन की रिंग उठाते हुए
‘मैंने सबसे पहले कहा “हैल्लो”
कैसी हो ?
उधर से जवाब आया ‘ठीक हु’ तुम बताओ ?
मैनें साँसे भरते हुए कहा ‘ हां’ ” मैं भी ठीक हु ” ।
और फिर वही जो अक्सर हम अपनी बातों में ले आते है “और बताओं” का सिलसिला शुरू हो गया ।
“और बताओ” एक ऐसा शब्द है जिसे सुनकर ऐसा लगता है कि बातें ख़त्म होने वाली है ।
ये शब्द कभी कभी “इग्नोर” जैसा फ़ील करवा देता है ।
और बताओं से शुरू हुई बातें और हमनें धीमें स्वर में कहा – “क्या बताऊं” ?
उसने तुरंत कहा – ” जो तुम्हारा दिल करें “।
अब बातें दिल पे आने लगी , और जब बात दिल की होती है तो हमें अपना ‘फ्यूचर’ दिमाग मे घूमने लगता है ।
हालांकि ऐसा प्रेम में होता नही है ।
बातों ही बातों में मैंने पूछ लिया तब “आगे का क्या सोची हो” ?
उसकी और हमारे बातों के दरमियां सन्नाटा पसर गया ।
शायद ये सवाल ही ऐसा हो , अक्सर लोग ख़ामोश ही हो जाते है ।
मग़र फिर भी उधर से जवाब आया “हा पढ़ रही हु और कोशिश करूंगी अच्छा करने का ” । उसने दबी आवाज़ में कहा ।
कोशिश नहीं कुछ अच्छा करों ..तुम पढ़ाई में बिल्कुल ज़ीरो हो ।
‘मैंने उसे थोड़ी उचे आवाज़ में कहा’
हा तुम तो मुझें “ज़ीरो” समझते ही हो तुम्हें लगता मैं कुछ नही कर सकती ।
‘उसने भी गुस्से भरे लहज़े में कहा ।’

अक्सर प्रेमी और प्रेमिका की शाम की ये बातें रोमांटिक होती होगी और होनी भी चाहिए । और जरूरी तब भी होता जब काफ़ी वक़्त से मिले न हो ।
लेकिन सीन यहां का कुछ और ही है । बस आनंद लेते जाइये ।
और फिर कुछ सोचने के बाद ‘हा मैं “ज़ीरो” ही हु लेकिन तुम्हें तो कोई दिक्कत नही है न ? ‘उसने सवालिए लहज़े में पूछा ‘
मैंने भी समझदारी के साथ दो लाइनें बोल डाली
“नेहा धूपिया” को याद करते हुए ।
“तुम्हारी लाइफ है तुम्हें बिल्कुल आज़ादी है जो चाहों करो हमें भला क्यों प्रॉब्लम “। ‘मैंने भी मज़किये लहज़े में जवाब दिया ।
ये शब्द सुनते ही हमारे फ़ोन कॉल के बीच सन्नाटा छा गयी । जैसे मानों फ़ोन कट चुकी हो ।
मग़र थोड़ी देर बाद जवाब आया ” अच्छा “।
‘उसने लंबी सांसे लेते हुए कहा’।
और फ़िर अंग्रेजी में कुछ बड़बड़ाई ….।
“हा बिल्कुल ‘नेहा धूपिया’ वाला ।
और तपाक से उसने एक और सवाल पूछ लिया ।
क्यों तुम्हारा कोई” स्टैंड “नही है क्या? ‘उसने प्रश्नवाचक चिन्ह लगाते हुए कहा । ‘
मामला थोड़ा सीरियस होता दिख रहा था ।
हमने तुरन्त कहा “नही हमारे फैमिली में स्टैंड शादी से पहले नही लिया जाता ” ।
वो फ़िर से ख़ामोश हो गयी ..”क्यूं चुप क्यों हो गयी”?
‘मैं नर्म लहज़े में पूछा ।’
और अचानक सवाल बदल कर हम वही पहुच गए
“और बताओं ”
सवाल काटते हुए हमनें पूछ लिया “वैसे स्टैंड क्या होता” ?
अंग्रेजी थोड़ी ख़राब है ‘हमनें मुस्कुराते हुए कहा’ ।
उसने बिना देर किए बोल पड़ी ‘मुझे भी नही पता’
‘अंग्रेजी मेरी भी ख़राब है ‘ मुस्कुराते हुए बोल पड़ी ।
मैं थोड़ा देर शांत रहा और सोचने लगा जवाब तो देना चाहिए मुझें ।
और तपाक से पूछा “स्टैंड का मतलब मेरे शब्दों में सुनना चाहोगी “।
“हा बताओं ” ‘उसने धीमे स्वर में कहा ‘।
तुम कही साईकिल के स्टैंड की तो नही बात कर रही ‘मज़किये लहज़े में मैन पूछा’।
हा हा वहीं । ‘ उसने मुस्कुराते हुए कहा’।
साईकिल या बाइक का स्टैंड समझ रही हो न वो क्या करता है ? ‘ मैंने सवालिए लहज़े में पूछा’
वो बाइक या साईकिल को खड़ा रखता है और उसे गिरने से बचाता है ।
उसी तरह परिवार में भी होता एक स्टैंड । अगर उसे हटा दोगे तो परिवार गिरने लग जाती है और उसे खड़ा रखने के लिए परिवार का मुखिया “स्टैंड” की तरह काम करता है ।
और मैंने फिर पूछा ‘कैसा लगा जवाब?’
“अच्छा है”। ‘उसने थोड़ी लंबी सांसे लेते हुए कहा’।
सच हमेशा से ही कड़वा होता है । ‘ मैनें उदाहरण देते हुए कहा’ ।
अगर तुमसे मैं वो बातें करने लग जाऊ तो तो तुम अभी के लिए बहुत ज्यादा खुश भी हो जाओगी और ये महसूस करोगी कितना ‘प्यार’ करता हु ।
और अगर सच बातों से रूबरू करवाने लगूंगा तो “दुश्मन” ।
नही मैं क्यू “दुश्मन” समझूँगी और कभी नही समझती । ‘ उसने दबे दबे स्वर में कहा’।
आदत से मजबूर मैं भी “और बताओं” जैसा सवाल पूछ लिया ।
“तुम ही बोलो” ‘बिना देर किए उसने ज़वाब दिया’
मानों ये जवाब रटा हो ।
ये सारी बातें तुम्हारे ही फ़ायदे के लिए है अभी भले ही बुरा लग रहा हो ।
तभी उधर से एक और अंग्रेजी के शब्द “सिम्प्थी” आ पहुचा ।
“यार ये अंग्रेजी में क्या बोलती हो” ? ‘मैंने मज़किये लहज़े में कहा ‘।
ज़रा मतलब भी बता दो ।
‘काहे की अंग्रेजी ख़राब है बचपन से और शायद इसलिए भी पसंद नही करते’।
कुछ समय हमारी बातों के दरमियां इक हंसी गूंज उठी ।
मैंने भी उस हँसी में अपनी हँसी घोल दी ।
और फिर वही सवाल की “आगे का कुछ सोची हो” ?
और फ़िर हँसते हँसते शामें खुशहाल हो गयी ।

-हसीब अनवर

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यादों के सिलसिले चलते ही रहते है , इश्क़ हो या मौत मिलते ही रहते है । -हसीब अनवर
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