बागी....नशीब को

दिल में उठ रही है,रंगेज की आवाज़े,
हसरत भी बना लेंगे,महफील में ताजे-ताजे
गुस्ताखियो में लूट ना,हम जैसे हबीब को
बागी बना लूँगा,डूबे हुए नशीब को

सार के पक-दण्डी पे रेंगते-रेंगते
भाग्य के पन्नों में भरूँ,कर्म की आदतें
बुजदिल कहना छोड़ दें,हम निर्बल गरीब को
बागी बना लूँगा,डूबे हुए नशीब को

वक्त के इम्तहान में,मंजिल को छू लूँगा
नगमों के मोतियों से,नैनो से मोती को चुन लूँगा
बसंत के हिय भाव से,खिलाऊ गुलाब को
बागी बना लूँगा,डूबे हुए नशीब को
राइटर-इंजी0नवनीत पाण्डेय सेवटा(चंकी)

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