कविता · Reading time: 1 minute

बाकी है

ख्वाबों के आकाश में,
अभी तो पंख फैलाएँ हैं मैंने मंजिल ।
असली उड़ान होसलों की ,
ज़िन्दगी में अभी बाकी है
देनें हैं कई इम्तेहान अभी ज़िन्दगी के नीलम तूने
नापी है मुट्ठी भर ज़मीन बस,
अभी तो सारा आसमान बाकी है।
खुद ही दबा रखीं हैं,
बर्दाश्त-ए-समंदर की लहरें।
कभी भी आ सकता है,
तुफान अभी बाकी है।
न सोच सनम के डरती है नीलम,
अपने संस्कारों पर गुमान अभी बाकी है।
पिये होंगे तुमने हंसी लबों से प्याले।
हम महज़ जाम नहीं,
मयखाना-ए-साकी हैं।

नीलम शर्मा✍️

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