बहू भी बेटी ही होती है

” बहू भी बेटी ही होती है “
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“नारी” विधाता की सर्वोत्तम और नायाब सृष्टि है | नारी की सूरत और सीरत की पराकाष्ठा और उसकी गहनता को मापना दुष्कर ही नहीं अपितु नामुमकिन है | साहित्य जगत में नारी के विविध स्वरूपों का न केवल बाह्य , अपितु अंतर्मन के गूढ़तम सौन्दर्य का बखान अनेक साहित्यकारों ने किया है | नारी, प्रकृति द्वारा प्रदत्त अद्भुत ‘पवित्र साध्य’ है ,जिसे महसूस करने के लिए ‘पवित्र साधन’ का होना जरूरी है | इसकी न तो कोई सरहद है और ना ही कोई छोर ! यह तो एक विराट स्वरूप है,जिसके आगे स्वयं विधाता भी नतमस्तक होता है | यह ‘अमृत-वरदान’ होने के साथ-साथ ‘दिव्य औषधि’ है | नारी ही वह सौंधी मिट्टी की महक है जो जीवन बगिया को महकाती है | नारी के लिए यह कहा जाए कि यह- “विविधता में एकता है” …तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | क्यों नारी के विविध रूप हैं | यह दादी , नानी , माँ ,बेटी , बहिन , बुआ, काकी ,ताई ,ननद ,भाभी ,देवरानी जेठानी इत्यादि कई स्वरूपों में अपना अस्तित्व बनाए हुए है | इन्हीं स्वरूपों में एक कर्तव्य की प्रतिमूर्ति और कर्मठता की देवी के रूप में “बहू” का अस्तित्व बहुत ही विराट स्वरूप वाला है | बहू ही है जो सम्पूर्ण परिवार की रीढ़ बनकर उसका संचालन करती है | वह ना थकती है ,ना बहकती है | बस ! निभाती जाती है अपनी सारी जिम्मेदारी और बिखेरती है उज्ज्वल छटा , घर के हर कोने में | उसी के दम पर घर स्वर्णिम एहसासों का मंदिर और धरती पर स्वर्ग के रूप में होता है | मगर क्या बहू बेटी है ? या फिर बहू , बहू ही होती है ! यह विषय बड़ा ही विकट और सोचनीय है | यदि हम सिंधुघाटी सभ्यता में झांक कर देखें तो हमें यही दृष्टिगोचर होता है कि बहू मातृशक्ति का ही एक सशक्त स्वरूप था | यही कारण रहा कि उस समय का समाज मातृसत्तात्मक था | बहू का यह स्वरूप वैदिक काल से होता हुआ विविध कालिक भ्रमण के द्वारा वर्तमान में पहुँचा है |
हम यह देखते हैं कि समाज में “विवाह संस्कार” के द्वारा ‘बेटी’ का स्वरूप ‘बहू’ के रूप में परिणित हो जाता है | जैसे ही यह स्वरूप बदलता है , कुछ मायने भी बदलते है | ये बदलाव बेटी में सकारात्मक दिशा में होते है क्यों कि वह अब बेटी से बहू के जिम्मेदारी पूर्ण ओहदे पर पहुँच चुकी होती है | उसके लिए सारा परिवेश नयापन लिए हुए होता है | फिर भी वह उस परिवेश में अपने को ढालती हुई अपना कर्तव्य सुनिश्चित करते हुए जिम्मेदारियों का निर्वहन बड़ी सहजता से करती है | पराये परिवार को अपना बनाने हेतु उसे बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है | आमतौर पर देखा जाता है कि बहू आते ही सास अपनी जिम्मेदारी से निवृत हो जाया करती हैं | हमारे समाज में भूतपूर्व दादी-नानी बहू को सिर्फ बहू के रूप में देखा करती थी | उनके लिए बहू काम करने की और वंश चलाने की एक मशीन होती थी | उस वक्त सास का एकछत्र राज चलता था और बहू उनके हर आदेश को सिरोधार्य माना करती थी | उस समय बहू सिर्फ बहू ही होती थी , कभी उसे बेटी मानने का प्रयास तक नहीं किया गया | बेटी मानना तो दूर , उसे बेटी की तरह मानना भी उनकी सोच में नहीं रहा | परन्तु आज वक्त बदला है …….. क्यों की उस समय की बहू आज सास के पद पर सुशोभित हैं | जो समझती है कि बहू का दर्द क्या होता है | बहू ही तो है , जो खुद को भूलकर परिवार को सतत् क्रियाशील रखती है और परिवार की खुशी के लिए अपनी हर खुशी बलिदान कर देती है | आज बहू को बहू मानने वाले लोगों की गिनती नगण्य है क्यों कि बेटी ही बहू बनती है | अब हर सास यह चाहने लगी है कि मेरी बहू केवल बहू नहीं बल्कि मेरी बेटी भी है | इसी परिवर्तन के कारण बहू की शान में चार चाँद लग चुके हैं | यदि चिंतन किया जाए ,तो यह जाहिर होता है कि तनाव घर की कब्र होता है और खुशियाँ घर का बाग ! अत : परिवार में खुशियों के लिए जरूरी भी है कि बहू को बेटी की तरह माना जाए | यदि बहू को बेटी के समान माना जाता है तो बहू की भी जिम्मेदारी हो जाती है कि वह बहू और बेटी दोनों का फर्ज अदा करे | परन्तु अफसोस !!!! आज सास तो सास नहीं रही क्यों कि उन्होंने सास को झेला था | परन्तु बहू , बहू ना रही | हाँ अपवाद हर जगह होते हैं ! लेकिन सत्य यह है कि आज के दौर में बेटियाँ पढ़-लिखकर आगे तो बढ़ चुकी हैं लेकिन जब बहू बनती हैं तो लगभग 70 फीसदी बहुऐं , बहूू की जिम्मेदारी नहीं निभा पाती | आज बहू नारी शक्ति के रूप में सशक्त तो हुई है परन्तु व्यक्तिगत आकलन करें तो वैचारिक और शारीरिक रूप से कमजोर हुई हैं | जो कि उन्हीं के लिए घातक है | खैर जो भी है पर नारी गरिमा को बनाए रखने के लिए बहू को बहू बनना ही पड़ेगा तभी वो बहू के नाम को सार्थक कर सकती हैं |
बहू भी बेटी की तरह होती है ….. यह बात बिल्कुल सही और सार्थक है | यदि हम कहें कि — बहू भी बेटी ही होती है , तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | क्यों कि यह विचार अपनाने से न केवल परिवार में समृधि और खुशहाली रहेगी अपितु समाज को भी एक नई दिशा मिलेगी जो सम्पूर्ण मानव जाति के लिए हितकर है | बहू भी बेटी ही होती है….इस विचार का मनोवैज्ञानिक असर भी बहू के व्यक्तित्व पर अपनी अमिट छाप छोड़ेगा |

बहू-बहू ना तुम करो , बहू सुता का रूप |
शीतल छाँव बहू बने ,जब हो गम की धूप ||

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— डॉ० प्रदीप कुमार “दीप”

                 

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