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बहुत उनको निहारा (गीतिका)

* बहुत उनको निहारा *
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जहां जब भी मिले हमने बहुत उनको निहारा।
बहुत सुन्दर लगी छवि प्रिय जिसे मन में उतारा।

सिसकती जिन्दगी है मुश्किलों के बीच बढ़ती।
जिएंगे किस तरह से यह नहीं हमने विचारा।

हुआ मजबूर जब जीवन अकेले ही चले हैं।
नहीं वो पास आए जब कभी हमने पुकारा।

बहुत डूबे हमेशा खूबसूरत से नयन में।
हकीकत है यही लेकिन बहुत है सिंधु खारा।

उड़ेंगे कल्पनाओं में जहां तक सोच होगी।
पड़ा है सामने सुन्दर खुला आकाश सारा।

कभी जब साथ फूलों के मिलेंगे शूल पथ में।
रहेगा संग यादों में मधुर हर पल गुजारा।

नहीं रुकना कठिन हो राह आगे हम बढ़ेंगे।
बहे विपरीत धारा के उसे मिलता किनारा।
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-सुरेन्द्रपाल वैद्य, १७/०९/२०२१

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