गज़ल/गीतिका · Reading time: 1 minute

बहिष्कार

हैवान आंसुओं में सब डुबोना चाहता है
तबाह करके सबको अब रोना चाहता है

उसने खुद लुटाई इज्जत अपने वतन की
अब ढोंगी फरियाद कर संजोना चाहता है

हैवानियत की सारी हदें लांघ दी जिसने
वो अब इंसानों में सामिल होना चाहता है

बहिष्कार करना है ऐसे फरियादियों का
जो ईर्ष्या के बीज भू पर बोना चाहता है

बयां करता है सारा सच जिसकी सच्चाई
वो कांटा अब गुलाबी पुष्प होना चाहता है

दबाकर आज भी रंजिश दिल में साहिब
मिलकर दरिंदा मुकम्मल होना चाहता है

रास आया नहीं चमकता हिंदुस्तान जिसे
वो कालिख लगा कर मुंह धोना चाहता है

अब सच्चाई का सिक्का उछालेगा सारा सच
क्यों चिल्लाकर बुजदिल चुप होना चाहता है

गुनाहों को यकीनन माफ़ कर देता भारत
पर कौन अपने परिवार को खोना चाहता है

जिसने धज्जियां उड़ाई संविधान की पूरी
वो दागदार अब सभी दाग धोना चाहता है

बहिष्कार करना होगा बुराइयों का जड़ से
जो अंधेरा कायम कर खुश होना चाहता है

बेपरवाह आलम संग साजिशों की सियासत
धोखेबाज छिपने को गली कोना चाहता है

जिसकी जमानत भी जब्त हो गई घर में
वो लालकिले का सरदार होना चाहता है

कुछ लोग आए हैं उसके बीच बचाव करने
उन्हें पता नहीं तख्तापलट होना चाहता है

देख रहा है हिंदुस्तान अपने गुनहगारों को
हर गुनाहों कि सजा भारत देना चाहता है

निकाल बाहर कर दो टिकैती डकैतों को
ज्योति अब हैवानों से हाथ धोना चाहता है

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