बहार देखते हैं

कभी पानी तो कभी आग देखते हैं
हम तेरी आंखों में एक रेगिस्तान देखते हैं…..
भटक न जाएं इस भूल भुलैया में
इसलिए बाहर से ही भीतर के तूफान देखते हैं….
तुम करती हो गिला मेरी बेरुखी का
और हम अपनी रिहाई के आसार देखते हैं….
समझाया तो हमने भी बहुत खुद को,लेकिन
अब हम भी सहरा में ही बहार देखते हैं……

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