Jun 2, 2020 · कविता
Reading time: 1 minute

बहार देखते हैं

कभी पानी तो कभी आग देखते हैं
हम तेरी आंखों में एक रेगिस्तान देखते हैं…..
भटक न जाएं इस भूल भुलैया में
इसलिए बाहर से ही भीतर के तूफान देखते हैं….
तुम करती हो गिला मेरी बेरुखी का
और हम अपनी रिहाई के आसार देखते हैं….
समझाया तो हमने भी बहुत खुद को,लेकिन
अब हम भी सहरा में ही बहार देखते हैं……

11 Likes · 11 Comments · 125 Views
Copy link to share
Seema katoch
98 Posts · 5.7k Views
Follow 9 Followers
Physics lecturer by profession... writing and reading poems is my hobby.... My mail id..... seemakatoch30@gmail.com... View full profile
You may also like: