बहती हवा का प्रश्न

एक ग़ज़ल
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रोशनी आँखों की खुद ही धुंध में खोता चला।
आदमी हर आदमी बस धुंध ही बोता चला।।
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बात हर वह जानकर भी बात को समझे नहीं।
मौत का सामान लेकर साथ में सोता चला।।
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इक दिया उम्मीद का ही रातभर जल क्या करे ?
जब सुबह का सूर्य ही हो तम को ले ढोता चला।।
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मैं, गगन में उड़ रहे उन पंछियों से क्या कहूँ ?
यह गगन को कौन औ क्यूँ आज है धोता चला।।
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चाँद भी घबरा रहा, अब हरकतों को देखकर।
इस जहाँ से आदमी का प्रेम अब रीता चला।।
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भाव अब कम बन रहे सीमित हुए हर दायरे।
फँस भँवर के जाल में मनमीत हर रोता चला।।
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क्यूँ रखे हो सरहदें , बहती हवा का प्रश्न #जय ?
जब यहाँ हर मुल्क में, हर पाप है होता चला।।
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#कलम_से

संतोष बरमैया#जय

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