कविता · Reading time: 1 minute

“बस रोक रखी थी”

टूट तो मैं कब की चुकी थी,
बस रोक रखी थी,खुद को बिखरने से|
एक कतरा समेटती,तो दूसरा छूट जाता,
फिर भी कोशिशें करती रहती,समेटने की,
साँसें थामी थीं ,कि कहीं थम न जाये,
बस कुछ और पल,शायद ज़िंदगी की समेट लूँ ,
बस रोक रखी थी, खुद को बिखरने से |
कशमकश तो देखिये,समेटने-बिखरने में ,
मैं तो खुद से ही छूट गयी,
अपने छूटे,सपने टूटे बंधन में ,
अनुबन्धन में जाने कितने रूठे,
जीतने की कोशिश में मैं तो हार गयी,
बस रोक रखी थी, खुद को बिखरने से||
…निधि…

49 Views
Like
Author
"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको"
You may also like:
Loading...