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** बस एक तेरी ही कमी है **

भूरचन्द जयपाल

भूरचन्द जयपाल

कविता

October 15, 2017

अब मैं अपनी बर्बादियों से
क्या कहूं
वो आबाद रही जीवनभर
मैं भागता रहा जीवनभर
और सलीका
मुझे जीने का कब था
मैं यूंही
राहे-जिंदगी में आ गया
वो मुझको भा गया
और
मैं उसको भा गया
ना जाने अब
वो प्यार कहां गया
गया गया गया अब
हाथ से आसमां निकल गया
न जाने
मेरे पैरों तले की धरती को
अब कौन निगल गया
रूखा रेगिस्तान था
वो दरिया बन
आंखों से निकल गया
नमी आज भी
आंखों की जमीं है
अब एक
उसकी ही कमी है
बस एक उसकी ही कमी है
वरना आंखों में अब
बर्फ़ फिर से जमी है
अब आके
सुलगा दे आग दिल की फिर
ये दिल की लगी
दिल्लगी तो नही है
आ अब हाथ अपने सेंक
इस आग पर बस तेरी ही कमी है सोंखली तेरे ग़म ने आंखों की नमी है ये बर्फ़ यूं ही नहीं जमी है
आ आसमां बन दिल की जमीं पर
ये धरती तो फिर भी यहीं जमीं है
वो शातिर था फिर भी मेरे दर्द से
वो पिघल गया बड़ा पत्थर दिल था
वो ना जाने मोम बन कब पिघल गया
आजा आजा ये धरती आज भी उसी जगह खड़ी है जहाँ छोड़ा था तुमने
बस एक तेरी ही कमी है
बस एक तेरी ही कमी है ।।

?मधुप बैरागी

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Author
भूरचन्द जयपाल
मैं भूरचन्द जयपाल स्वैच्छिक सेवानिवृत - प्रधानाचार्य राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, कानासर जिला -बीकानेर (राजस्थान) अपने उपनाम - मधुप बैरागी के नाम से विभिन्न विधाओं में स्वरुचि अनुसार लेखन करता हूं, जैसे - गीत,कविता ,ग़ज़ल,मुक्तक ,भजन,आलेख,स्वच्छन्द या छंदमुक्त रचना आदि... Read more

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