Skip to content

बसा परदेश में आकर अकेला छोड़कर माँ को

विवेक आस्तिक

विवेक आस्तिक

मुक्तक

January 3, 2017

(1)-दहल जाता हृदय हरपल करारी पीर देती है ।
उदासी मुख पे ‘ छा जाती नयन भर नीर देती है ।
बसा परदेश में आकर अकेला छोड़कर माँ को,
सताती याद जब उसकी कलेजा चीर देती है ।
—‘———-
(2)-
पिता माता के ‘ चरणों में सदा मैं सिर झुकाता हूँ ।
शिवाले, मस्जिदें, गिरिजा सभी को भूल जाता हूँ ।
बना घर एक मन्दिर है जहाँ बसते मेरे भगवन,
नहीं जाता कभी तीरथ सुमन घर में चढ़ाता हूँ ।
– – – – – –
(3)-
सुनहरा कल मिलेगा आस इसकी टूट जाती है ।
अभागिन सौत सी होती, ये ‘ किस्मत फूट जाती है ।
जरा जाकर के ‘ पूछो तो गुजरता दिल पे ‘ क्या उनके,
कि जिनकी पेट की खातिर पढ़ाई छूट जाती है ।
– – – – – – – –
(4)-
किसी पावन मुहब्बत का छिपाया राज जिंदा है ।
कि गोकुल के कन्हैया का तराना साज जिंदा है ।
भले कितना भी बदला हो जमाना तोड़कर रश्में,
मगर अम्मा की ‘ लोरी का वही रीवाज जिंदा है ।
-‘———-
(5)-
यहाँ कुछ लोग मिलते हैं मे’रा दिल तोड़ देते हैं ।
भरी ख्वाबों की ‘ गागर को ये ‘ पल में फोड़ देते हैं ।
नहीं देते कभी लगने मुहब्बत को किनारे से,
चढ़ाकर नाव पर मुझको भँवर में छोड़ देते हैं ।
– – @विवेक आस्तिक – – – –

Share this:
Author
विवेक आस्तिक
विवेक आस्तिक, पिता का नाम - श्री राम आसरे शर्मा, पता -शाहजहांपुर ( उ.प्र ) सम्पर्क -9958017216 प्राप्त सम्मान/पुरस्कार - कादम्बिनी राष्ट्रीय हिन्दी मासिक पत्रिका का युवा रचनाकार प्रोत्साहन सम्मान - दिसम्बर ( 2013)। मुक्तक पुष्प , मुक्तक सम्राट व... Read more

क्या आप अपनी पुस्तक प्रकाशित करवाना चाहते हैं?

आज ही अपनी पुस्तक प्रकाशित करवायें और आपकी पुस्तक उपलब्ध होगी पूरे विश्व में Amazon, Flipkart जैसी सभी बड़ी वेबसाइट्स पर

साथ ही आपकी पुस्तक ई-बुक फॉर्मेट में Amazon Kindle एवं Google Play Store पर भी उपलब्ध होगी

साहित्यपीडिया की वेबसाइट पर आपकी पुस्तक का प्रमोशन और साथ ही 70% रॉयल्टी भी

सीमित समय के लिए ब्रोंज एवं सिल्वर पब्लिशिंग प्लान्स पर 20% डिस्काउंट (यह ऑफर सिर्फ 31 जनवरी, 2018 तक)

अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें- Click Here

या हमें इस नंबर पर कॉल या WhatsApp करें- 9618066119

Recommended for you