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बसंत पंचमी

मातु शारदे दीजिए, यही एक वरदान !
दोहों पर मेरे करे, जग सारा अभिमान !!
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मातु शारदे को सुमिर, दोहे रचूँ अनंत !
जीवन मे साहित्य का,छाया रहे बसंत! !
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सरस्वती से हो गया ,तब से रिश्ता खास !
बुरे वक्त में जब घिरा,लक्ष्मी रही न पास !!

श्वासों का मनका बना, जपूँ तुम्हारा नाम !
दया करो माँ शारदे , वरदाती सुखधाम !!

हे माँ वीणा वादिनी, करें कंठ मे वास !
इतनी सी माँ आपसे,करे भक्त अरदास! !

हे माता वागीश्वरी, ………दें ऐसा वरदान !
मिले राष्ट्र को ज्ञान का,दुनिया मे सम्मान ! !

मातु शारदा रच रही, ..मेरे छंद तमाम !
मैं नीचे लिखता रहा, नाहक अपना नाम !!

आई है ऋतु प्रेम की,….. आया है ऋतुराज !
बन बैठी है नायिका ,सजधज कुदरत आज !!
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जिसको देखो कर रहा, हरियाली का अंत !
आँखें अपनी मूँद कर, रोये आज बसंत !!
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पुरवाई सँग झूमती,.. शाखें कर शृंगार !
लेती है अँगडाइयाँ ,ज्यों अलबेली नार !!
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ज्यों पतझड़ के बाद ही,आता सदा बसंत !
त्यों कष्टों के बाद ही,खुशियां मिलें अनंत !!
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सर्दी-गर्मी मिल गए , बदल गया परिवेश !
शीतल मंद सुगंध से, महके सभी “रमेश” !!
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हुआ नहाना ओस में ,…तेरा जब जब रात !
कोहरे में लिपटी मिली,तब तब सर्द प्रभात !!
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कन्याओं का भ्रूण में,….. कर देते हैं अंत !
उस घर में आता नही, जल्दी कभी बसंत !!

बने शहर के शहर जब, कर जंगल काअंत ।
खिड़की में आये नजर, हमको आज बसंत॥

खिलने से पहले जहाँ , किया कली का अंत I
वहां कली हर पेड़ की, …रोये देख बसंत II

फसलें दुल्हन बन गई,मन पुलकित उल्लास I
आशा की लेकर किरण, ..आया है मधुमास II

पिया गये परदेश है… ..,आया है मधुमास I
दिल की दिल मे रह गये,मेरे सब अहसास II
रमेश शर्मा

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RAMESH SHARMA
RAMESH SHARMA
मुंबई
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दोहे की दो पंक्तियाँ, करती प्रखर प्रहार ! फीकी जिसके सामने, तलवारों की धार! !...
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