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बर्फ का गोला

NIRA Rani

NIRA Rani

कविता

October 21, 2016

आज फिर वही तपती दोपहर थी
वही पगडंडी थी .वही गर्म रेत थी
नही थे तो बस तुम!!!
याद है …हम दोनो घंटों उस पगडंडी पे
बर्फ के गोले वाले का इंतजार करते थे .
सच तो ये है ..एक दूसरे को करार दिया करते थे
उसके आते ही तुम चाशनी की मॉग करते थे
और मै काला खट्टा की जिद्द करती थी
जिदंगी बर्फ के गोले जैसी सिमट गई है
जरा सी गर्माहट पे पिघल जाती है
काश! वो दिन फिर से लौट आए !!
मै चाशनी मे घुल जाउंगी
तुम काला खट्टा खा लेना

Author
NIRA Rani
साधारण सी ग्रहणी हूं ..इलाहाबाद युनिवर्सिटी से अंग्रेजी मे स्नातक हूं .बस भावनाओ मे भीगे लभ्जो को अल्फाज देने की कोशिश करती हूं ...साहित्यिक परिचय बस इतना की हिन्दी पसंद है..हिन्दी कविता एवं लेख लिखने का प्रयास करती हूं..
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