“बरसो नयन से”

ओ गगन के बादलों ,
नीर बन बरसो नयन से,
तन तो भीगे मन भी भीगे ,
भीगे अन्तरघट सारा,
ऐसे बरसो धार बनकर ,
अंक मेरी सरिता बने,
बहती- बहती जाकर मिले,
कोई गहरे सागर से,
सागर का मंथन हो जब ,
कोई हलाहल पी जाये,
बन जाये वो मेरे लिये,
नीलकंठ ओंकारा |
…निधि…

2 Comments · 18 Views
Copy link to share
"हूँ सरल ,किंतु सरल नहीं जान लेना मुझको, हूँ एक धारा-अविरल,किंतु रोक लेना मुझको" View full profile
You may also like: