Jun 11, 2021 · कविता
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बरसात

1) गीत

शुन्य हृदय में प्रेम की,गहन जलद बरसात।
गहन अँधेरा कर गयी, पावस की यह रात।।

झुलस रही हूँ अग्नि-सी, बढ़ा दिया संताप।
मुझ विरहण को यूँ लगे, दिया किसी ने श्राप।।
शोक-गीत गाने लगे, जुगनू एक जमात।
गहन अँधेरा कर गयी, पावस की यह रात।।

घिरी याद की बदलियाँ, नस-नस बढ़ती पीर।
नवल मेघ जल बिन्दु से, नयन भरे हैं नीर।
छेड़े बिजुरी को कभी, करे घटा से बात।
गहन अँधेरा कर गयी, पावस की यह रात।।

रोम-रोम बेसुध पड़ा,अंतस भर कर शोर।
कठिन प्रलय की रात यह, कैसे होगी भोर।।
चाँद सितारे छुप गये, सिसक रहे जज्बात ।
गहन अँधेरा कर गयी, पावस की यह रात।।

शुन्य हृदय में प्रेम की,गहन जलद बरसात।
गहन अँधेरा कर गयी, पावस की यह रात।।
-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

2) दोहा

छम-छम बारिश ने किया, पावस का आगाज।
हवा सुहानी बह रही, झूम रहे वनराज।। १

वर्षा आई झूम कर, प्रकृति भाव विभोर।
बूँद-बूँद जादू भरा, मौसम है चितचोर।। २

वर्षा की हर बूँद में, सुन्दर सुखद मिठास।
आज सखी पूरी हुई, मेरे मन की आस।। ३

वर्षा रानी आ गई, कर सोलह श्रृंगार।
उसके आने से मगन,ये पूरा संसार।। ४

वर्षा की ध्वनि हृदय में ,भर देती है प्रीत।
प्रणयातुर शत कीट खग, गाते मंगल गीत।। ५

नीले अम्बर में घटा,जब छाई घनधोर।
पंख खोलकर नाचता, तब जंगल में मोर।।६

खुश होती बरसात जब,करें कई उपकार।
क्रोधित हो जाये अगर, करती सब संहार।। ७

कहो सखी किससे कहें, अपने मन की पीर।
पिया बिना बरसात में, बहे नयन से नीर।। ८

मेध बहुत मन के गगन, मगन मयूरी नाच।
दर्द दबा कर कंठ में,सह पीड़ा की आँच।। ९

-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

3) मुक्तक

टपकता रहता घर जिसका टूटा फूटा छप्पर है।
फिर भी ‘बारिश हो जाये’ ध्यान लगाये नभ पर है।
वो खेतों की मेड़ों पर उदास अकेला बैठा है –
इस बार बरस जाना मेघा कर्जा मेरे सर पर है।1

कृषक जनों की सुनकर पुकार।
बरसो मेघा मूसलाधार।
जूझ रहे हैं वो कमियों से –
जीवन में छाया अंधकार।2

वर्षा रानी को देख कर खुश हो रहा किसान।
मन में उसके सज गये आज हजारों अरमान।
गुनगुनाता गीत गाता काधे पर हल लेकर-
चल दिया वह भींगता खेतों में रोपने धान।3

उमड़-घुमड़ कर छम-छम करती पावस सुख बरसाने आई ।
पंक्ति बद्ध हो कमर झुकाए करें नारियाँ धान रुपाई ।
श्रम सुन्दरियाँ तन्मयता से हाथ लिए नन्हें बिरवा को-
अद्भुत लय में गायन करती वसुन्धरा की गोद सजाई ।4

श्वेत शीतल, निर्मल बूँदों की बरखा पहनी चुनर है।
बिजली की पायल पहने बरखा लगती अति सुन्दर है।
श्यामल, उज्ज्वल, कोमल,लहराता सुरभित केश गगन में –
इस आकर्षित प्यारी छवि पर मोहित सब नारी नर है।5
-लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

4)
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छम-छम बदरा बरस रहा है।
विरहन मन ये तरस रहा है।

शीतल पवन चले आरी-सी,
बूंद-बूंद फिर विहस रहा है।

आग कलेजे में धधकी यूं,
नस-नस मद में लनस रहा है।

गाज गिरे ऐसे मौसम पर,
झरी नेह की परस रहा है।

कैसे धीर धरूँ साजन जी,
दर्द भरा जब दिवस रहा है।

सुध-बुध खो देती है मेरी,
तुम बिन जीवन निरस रहा है।

एक दूजे के चिर प्रेम में,
लीन प्रिये दिन सरस रहा है।
लक्ष्मी सिंह
नई दिल्ली

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लक्ष्मी सिंह
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MA B Ed (sanskrit) My published book is 'ehsason ka samundar' from 24by7 and is... View full profile
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