कविता · Reading time: 1 minute

बरसात निंगोड़ी….

बरसात निंगोड़ी….

क्या करूँ मैं इस बरसात निंगोड़ी का,
अपनी तो ऐसी बैरन हुई, जी जान से बैर निभावे है !
जब बरसे है झूम झूम, …………..!
तृप्त होता सृष्टि का रोम रोम ….!
एक हम ही दुश्मन इसके…………!
जब पड़े बूँद गात पर, जिया में आग लगावे हैं !
तड़पे है तन बदन ऐसे ….!
बिन पानी मछली जैसे …!
सारे जग से प्रीत करे, कम्बखत हमसे अच्छा बैर निभावें है !!
!
!
!
डी. के. निवातियाँ ____!!!

1 Like · 4 Comments · 43 Views
Like
You may also like:
Loading...