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बरसात, “आफत या सौगात”

गर्मी से राहत, बारिश की थी चाहत।
बूंदों का, झूम कर सबने किया स्वागत।।
प्रफुल्लित मन, खिल उठे वन उपवन।
धरती की प्यास बुझी, महक उठा जीवन।।

मेघों ने भी ठान लिया, खुशी को उसने भान लिया।
झूम कर बरसा, कुछ दिनों तक ना सांस लिया।।
थक कर, थोड़ा रुक कर, सब पर ध्यान दिया।
भरे जलाशय, अनजान बन सब भुला दिया।।

टपकते छत और घरों में पानी, सांप कीड़े करे शैतानी।
आहत मन और अस्त व्यस्त जन जीवन,
बरसात की खुशी पर लग गया प्रश्न।
बरसात की ये कैसी मनमानी, या इंसानों ने कि बेईमानी।

कितनी बार कृष्ण गोवर्धन उठाएं।
आखिर इंसान अपनी गलती क्यों दोहराए।।
कहीं सूखा कहीं बाढ़, बन ना सका अबतक एक द्वार।।
मौजूद है आज सब साधन, फिर भी विपदा है जलप्लावन।
क्या मनुष्य बरसात से हो सका प्रसन्न??

स्वरचित एवं मौलिक
© सरल

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